बाबा केदार की पूजा पर कांग्रेस में घमासान
देहरादून | बाबा केदार की पूजा को लेकर कांग्रेस में
अंदरखाने घमासान की नौबत है। मंगलवार को पूजा की तिथि को लेकर क्षेत्रीय
सांसद सतपाल महाराज की आपत्ति के बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बुधवार
को खुलकर मोर्चा संभाला। पलटवार में कहा कि केदारनाथ धाम में पूजा की तारीख
प्रदेश की पर्यटन व संस्कृति मंत्री और सतपाल महाराज की धर्मपत्नी अमृता
रावत की सहमति से तय हुई है।लेकिन, मुख्यमंत्री बहुगुणा खुद इसमें शामिल
नहीं हो सके। अब इससे पार्टी को मिलने वाले सियासी लाभ पर उनकी गैरमौजूदगी
से पड़ने वाले असर को लेकर कांग्रेसी गुणा-भाग में लगे हैं। बीती 16 व 17
जून को दैवीय आपदा के बाद से केदारनाथ समेत केदारघाटी में हजारों की संख्या
में श्रद्धालु लापता हैं। यह माना जा रहा है कि आपदा में उक्त लोग जान
गवां चुके हैं।केदारनाथ धाम में पसरे मरघटी सन्नाटे के बीच 86 दिन बाद
पूजा-अर्चना दोबारा शुरू करने को सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी। स्थानीय
लोगों, पंडे-पुरोहितों और श्रद्धालुओं के बगैर पूजा को लेकर उठे कदमों से
विवाद गहरा गया है। बाहरी विरोध झेल रही सरकार को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब
क्षेत्रीय सांसद सतपाल महाराज ने पूजा के मुहूर्त को शुभ करार नहीं दिया।
इस
मामले में सांसद महाराज ने बीती मंगलवार को पूजा शुरू होने से महज 15 घंटे
पहले 'चित भी मेरी, पट भी मेरी' अंदाज में सरकार को कठघरे में खड़ा करने से
गुरेज नहीं किया। हालांकि, प्रदेश में पर्यटन मंत्री के ओहदे पर उनकी
पत्नी अमृता रावत भी हैं तो उनके खेमे के सबसे मुखर समझे जाने वाले विधायक
और बदरी-केदार मंदिर समिति अध्यक्ष गणोश गोदियाल की पूजा की तारीख तय करने
में अहम भूमिका रही।इसी खेमे के एक और विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष
अनुसूया प्रसाद मैखुरी भी केदारनाथ धाम में जल्द पूजा शुरू करने के पक्षधर
हैं। इसी वजह से मुख्यमंत्री ने भी पूजा के फैसले पर सांसद की ओर से उठाई
गई अंगुली का उसी अंदाज में जवाब भी दिया। नतीजा पूजा को लेकर पार्टी एकजुट
दिखने के बजाए बंटी नजर आ रही है। केंद्रीय मंत्री और हरिद्वार सांसद हरीश
रावत पूरे प्रकरण में तटस्थ रहे।
हालांकि, दैवीय आपदा के बाद हवाई
दौरे के बजाए मोटर मार्ग से ही प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने वाले
पार्टी के वरिष्ठ नेता के पूजा कार्यक्रम में शरीक न होने को पूजा की तारीख
और तरीके पर उनकी असहमति के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर चर्चा
यह भी है कि केदारनाथ में बुधवार से पूजा को प्रदेश सरकार ने प्रतिष्ठा का
प्रश्न तो बनाया, लेकिन खुद मुख्यमंत्री उसमें शिरकत नहीं कर पाए। पूजा की
व्यवस्था की निगरानी के बजाए दिल्ली दौरा मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में
रहा।केदारनाथ में जल्द पूजा शुरू कर हिंदू भावनाओं को भुनाने और शंकराचार्य
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की पहल के जरिए भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के
हाथ बाजी न लगने देने की पार्टी की कोशिशों पर मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी
के चलते क्या खोया, क्या पाया के अंदाज में कांग्रेसियों में बहस-मुबाहिस
छिड़ी हुई है।

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