फ़िल्म रिव्यू: हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया
रेटिंग: ***
अगर ये फ़िल्म होशियारी से, संवार कर, अच्छे बजट में नहीं बनाई गई होती, अगर इसमें कलाकारों का अभिनय अच्छा ना होता तो ये एक बी ग्रेड की बॉलीवुड फ़िल्म या 'दिलवाले दुल्हनिया' ले जाएंगे जैसी क्लासिक का यूट्यूब स्पूफ़ बनकर रह जाती.
मुझे यक़ीन है कि फ़िल्म की कहानी को लिखते वक़्त लेखक ने इन चुनौतियों का सामना ज़रूर किया होगा क्योंकि ये फ़िल्म शाहरुख़ ख़ान और काजोल की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' को ट्रिब्यूट है.आशुतोष राणा बने हैं अमरीश पुरी जैसे कड़क पिता.'काजोल' यानी आलिया भट्ट के लिए उनका
परिवार एक स्मार्ट पंजाबी 'परमीत सेठी' नुमा लड़के को दूल्हे के रूप में चुनते हैं.लेकिन लड़की को, दिल्ली के रहने वाले एक लड़के (वरुण धवन) से प्यार हो जाता है.हीरो, लड़की के परिवार वालों का दिल जीतने उसके घर आता है.
प्रस्तुतिकरण
यहां वरुण का किरदार, 90 के दशक की कुछ हिट हास्य फ़िल्मों के गोविंदा की तरह है.बस यही फ़िल्म की कहानी है. लेकिन फिर भी इसके बावजूद अपने प्रस्तुतिकरण की वजह से ये देखने लायक बनी है.भारतीय घरों में चुलबुले बच्चों को एक घर का नाम देना पुरानी प्रथा है. और अक्सर ये नाम बच्चों के साथ ताउम्र चिपक जाता है.
मेरा भी एक ऐसा ही नाम है जिसे मैं आप लोगो को नहीं बताउंगा. बहरहाल इस फ़िल्म के हीरो का भी ऐसा ही नाम है, हंप्टी. और उसके दोस्तों के नाम हैं शॉन्टी और पपलो.ये सभी दिल्ली के आम लड़कों की तरह ज़िंदगी बिताते हैं. छोटी-छोटी बातों पर लड़ते हैं और ख़ालिस दिल्ली स्टाइल की हिंदी में बात करते हैं.
90 के दशक का टच
कहानी की हीरोइन हैं अंबाला की रहने वाली आत्मविश्वास से भरी लड़की (आलिया भट्ट) जिसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा है मनीष मल्होत्रा का डिज़ाइन किया हुआ लाखों का लहंगा पहनना.नवोदित लेखक, निर्देशक शशांक कलानी ने मौजूदा सेट-अप वाली कहानी को पूरा 90 के दशक के बॉलीवुड का टच दिया गया है.
फ़िल्म में है हीरोइन के कड़क पिता, एक सीधी-सादी भोली मां, हीरो के छुटभैये दोस्त, जिनके पास हीरो के इर्द-गिर्द मंडराने के सिवाय और कोई काम नहीं है.
निर्देशक ने फ़िल्म में कई ऐसे मोमेंट्स डाले हैं जब दर्शकों को लगता है कि कहानी बड़ी प्रेडिक्टबल हो रही है लेकिन अचानक कुछ ऐसा होता है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती.
अच्छा अभिनय
अच्छी बात ये है कि इसके बावजूद निर्देशक ने फ़िल्म को बेहद मेलोड्रैमेटिक होने से बचाए रखा है और फ़िल्म को मज़ेदार बनाए रखा है.वरुण धवन और आलिया भट्ट ने बेहतरीन काम किया है.
बस फ़िल्म में एक कमी है, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसे तमाम सीन, किरदारों और परिस्थितियों का बार-बार पर्दे पर आना आपको परेशान कर सकता है. लेकिन फ़िल्म अपने बलबूते खड़ी रहती है.
'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी बहुत कम फ़िल्में होती हैं जो सालों तक याद रखी जाएं. ये वैसी फ़िल्म ना सही लेकिन कुछ हफ़्तों तक तो ज़रूर इसकी चर्चा होगी.
अगर ये फ़िल्म होशियारी से, संवार कर, अच्छे बजट में नहीं बनाई गई होती, अगर इसमें कलाकारों का अभिनय अच्छा ना होता तो ये एक बी ग्रेड की बॉलीवुड फ़िल्म या 'दिलवाले दुल्हनिया' ले जाएंगे जैसी क्लासिक का यूट्यूब स्पूफ़ बनकर रह जाती.
मुझे यक़ीन है कि फ़िल्म की कहानी को लिखते वक़्त लेखक ने इन चुनौतियों का सामना ज़रूर किया होगा क्योंकि ये फ़िल्म शाहरुख़ ख़ान और काजोल की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' को ट्रिब्यूट है.आशुतोष राणा बने हैं अमरीश पुरी जैसे कड़क पिता.'काजोल' यानी आलिया भट्ट के लिए उनका
परिवार एक स्मार्ट पंजाबी 'परमीत सेठी' नुमा लड़के को दूल्हे के रूप में चुनते हैं.लेकिन लड़की को, दिल्ली के रहने वाले एक लड़के (वरुण धवन) से प्यार हो जाता है.हीरो, लड़की के परिवार वालों का दिल जीतने उसके घर आता है.
प्रस्तुतिकरण
यहां वरुण का किरदार, 90 के दशक की कुछ हिट हास्य फ़िल्मों के गोविंदा की तरह है.बस यही फ़िल्म की कहानी है. लेकिन फिर भी इसके बावजूद अपने प्रस्तुतिकरण की वजह से ये देखने लायक बनी है.भारतीय घरों में चुलबुले बच्चों को एक घर का नाम देना पुरानी प्रथा है. और अक्सर ये नाम बच्चों के साथ ताउम्र चिपक जाता है.
मेरा भी एक ऐसा ही नाम है जिसे मैं आप लोगो को नहीं बताउंगा. बहरहाल इस फ़िल्म के हीरो का भी ऐसा ही नाम है, हंप्टी. और उसके दोस्तों के नाम हैं शॉन्टी और पपलो.ये सभी दिल्ली के आम लड़कों की तरह ज़िंदगी बिताते हैं. छोटी-छोटी बातों पर लड़ते हैं और ख़ालिस दिल्ली स्टाइल की हिंदी में बात करते हैं.
90 के दशक का टच
कहानी की हीरोइन हैं अंबाला की रहने वाली आत्मविश्वास से भरी लड़की (आलिया भट्ट) जिसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा है मनीष मल्होत्रा का डिज़ाइन किया हुआ लाखों का लहंगा पहनना.नवोदित लेखक, निर्देशक शशांक कलानी ने मौजूदा सेट-अप वाली कहानी को पूरा 90 के दशक के बॉलीवुड का टच दिया गया है.
फ़िल्म में है हीरोइन के कड़क पिता, एक सीधी-सादी भोली मां, हीरो के छुटभैये दोस्त, जिनके पास हीरो के इर्द-गिर्द मंडराने के सिवाय और कोई काम नहीं है.
निर्देशक ने फ़िल्म में कई ऐसे मोमेंट्स डाले हैं जब दर्शकों को लगता है कि कहानी बड़ी प्रेडिक्टबल हो रही है लेकिन अचानक कुछ ऐसा होता है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती.
अच्छा अभिनय
अच्छी बात ये है कि इसके बावजूद निर्देशक ने फ़िल्म को बेहद मेलोड्रैमेटिक होने से बचाए रखा है और फ़िल्म को मज़ेदार बनाए रखा है.वरुण धवन और आलिया भट्ट ने बेहतरीन काम किया है.
बस फ़िल्म में एक कमी है, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसे तमाम सीन, किरदारों और परिस्थितियों का बार-बार पर्दे पर आना आपको परेशान कर सकता है. लेकिन फ़िल्म अपने बलबूते खड़ी रहती है.
'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी बहुत कम फ़िल्में होती हैं जो सालों तक याद रखी जाएं. ये वैसी फ़िल्म ना सही लेकिन कुछ हफ़्तों तक तो ज़रूर इसकी चर्चा होगी.

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