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सिस्टम से हारी स्टूडेंट्स, यहां भी दो आंसू बहा दो

अपनी बात.. प्रभु मिश्र
हैदराबाद रोहित बेमुला की आत्महत्या.. दुखद घटना है। लेकिन उस पर हो रही राजनीति गलत है। राहुल गांधी दो-दो बार जाकर रो रहे हैं। केजरीवाल ने भी खूब आंसू बहाये। जातियां खत्म करने की बात करते हैं और खुद ही जातिवाद को बढ़ावा देते हैं। वह नेता, वह मीडिया वह समाज काश, दो आंसू उत्तरप्रदेश की सामान्य वर्ग की छात्र सरिता द्विवेदी के लिए भी बहा देते, उसने भी तो सिस्टम से हारकर सुसाइड किया है। आरक्षण से दुखी होकर, एससी एक्ट से दुखी होकर।
पढ़िये.. काकोरी के मलाहां गांव में बेहद गरीब परिवार में पैदा हुई गिरीश द्विवेदी की पुत्नी सरिता का सुसाइड नोट..
पापा मैंने हार नहीं मानी, पर हमें सामान्य जाति के होने का अभिशाप था। क्योंकि ज्यादा पढ़ाई या प्रोफेशनल कोर्स करना या कराना हम लोगों की क्षमता से बाहर है। पापा मैं तो जा रही। इन हत्यारों से ये पूछना कि जब सामान्य वालों के लिए कहीं जगह नहीं है तो हर हॉस्पीटल में ये बोर्ड लगवा दें कि सामान्य वर्ग के स्त्नी के शिशु जन्म लेने से पहले ही मार डालें। सब अपना-अपना जातिवाद फैला रहे हैं। समाज की क्या स्थिति होती जा रही है। पापा, लोग लड़कों को स्टडी के लिए भेजते हैं पर आपने भरोसे के साथ भेजा। मैं बार-बार कह रही थी मैं हार नहीं मानूंगी। बस, आरक्षण अभिशाप के कारण मैं अब जीना नहीं चाहती। सामान्य वर्ग में जन्म लेना अभिशाप और सजा है। सब जगह आरक्षण का अभिशाप। यदि हम कोई फार्म भरते हैं तो उसके पैसे कहां से लाएं ? पापा, आपके पास भी तो इतनी ताकत नहीं रही ? मुङो बुरा लगता कि जब मेरे खेत में जानवर चराने वालों को मना करती हूं तो वह गंभीर धाराओं में कार्रवाई कराने को धमकाते हैं। मैं पुलिस की वर्दी तो नहीं पहन सकी, लेकिन एनसीसी की वर्दी घर में रखी है, जिसे मेरी चिता के पास रख देना। मम्मी मेरा सपना था वर्दी पहनने और इंसाफ की बात का। इसलिए मैं दौड़-दौडकर पेट की मरीज बन गई। 100 नंबर दौड़ में पाने के बाद मैं और आप लोग बहुत खुश थे। मम्मी इतना जरूर पूछना कि जब मेरिट रिलीज हुई थी तब जनरल लडकी की कोई मेरिट नहीं बनी। जय हिंद , जय भारत। जय धरती माता की मुङो अपनी गोद में स्थान दो। जय भारत माता की। हम पुलिस, हम पुलिस, हम पुलिस खत्म इंतजार। यह उपरोक्त कुछ लाइनें सरिता द्विवेदी के 9 पेज के सुसाइड नोट की हैं और विश्वास कीजिए कि यदि आप पूरा सुसाइड नोट पढ़ लेंगें तो शरीर का रोयाँ रोयाँ रोने लगेगा । पर कोई इधर क्यों देखेगा.. वह तो सामान्य वर्ग की थी, आई थी चली गई। अब पुलिस सुसाइड नोट की जांच कर रही है कि असली है या नहीं..।

यही स्थिति हर सामान्य वर्ग के छात्र की है। जहां तक एससी एसटी एक्ट की बात है तो इसने देश भर विशेषकर बुंदेलखंड में सामान्य वर्ग और ओबीसी का जीना मुश्किल कर दिया है। एक केस लगाओ, किसी को भी जेल में डलवा दो। जांच बाद में होती रहेगी। अब समय आ गया है कि इन सब में बदलाव हो।

(साभार :- पत्रकार प्रभु मिश्र के फेसबुक से )

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