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नमो शिवाय की कैमिस्ट्री और उसके मायने ....

राकेश अग्निहोत्री (सवाल दर सवाल)
पीएम नरेंद्र मोदी 18 फरवरी को जम्बूरी मैदान में होने वाले किसानों की ऐतिहासिक सभा के बीच शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी के अभी तक के सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर स्थापित करेंगे। फसल बीमा योजना को केंद्र बिन्दू बनाकर आयोजित इस कार्यक्रम को देश के दूसरे राज्यों को नजरअंदाज कर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में करने के मकसद साफ है कि शिवराज ने बतौर सीएम किसानों के लिए जो कुछ किया वो दूसरों से बेहतर और अलग है जिसके कारण मध्यप्रदेश को लगातार चौथी बार कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है। मोदी के इस दौरे को यादगार बनाने के लिए बीजेपी ने यदि अभी तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ने के लिए सांसद, विधायक, मंत्री और पदाधिकारियों के साथ बैठक कर सफलता की रणनीति बनाना शुरू कर दी है तो स्वयं शिवराज लीक से हटकर सीएम हाउस पर किसानों का सम्मान करते हुए नजर आए। सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या ये सिर्फ शिवराज के आग्रह पर मोदी मप्र आ रहे हैं या फिर बात कुछ और है। मोदी ने ही शिवराज को सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर स्थापित करने के लिए इसमें विशेष दिलचस्पी ली है। सवाल पर्दे के पीछे ही सही संघ की उस भूमिका को लेकर भी खड़े किए जा सकते हैं जिसने नमो-शिवाय की मजबूत हो रही कैमेस्ट्री को एक नई दिशा दी है तो आखिर उसके पीछे रणनीति क्या है?
 
शिवराज ने दिग्विजय सिंह के 10 साल का कीर्तिमान तोड़कर जब एक नया इतिहास सूबे की राजनीति मेंलिखा तब लगे हाथ ये सवाल भी खड़ा हो गया था कि आखिर चौहान के खाते में अगली उपलब्धि क्या होगी और वो लोकप्रियता की एक और पायदान चढ़ेंगे तो उन्हें किस तौर पर याद किया जाएगा? शायद इस नई स्िक्रप्ट का अगला पड़ाव 18 फरवरी बनेगी जब कोई और नहीं, अटल-आडवाणी युग को समाप्त कर बीजेपी के नई आइकॉन बनकर उभरे नरेंद्र मोदी खुद बतौर पीएम शिवराज की पीठ थपथपाते हुए नजर आएंगे। चौहान का गुणगान इसलिए नहीं कि उनमें चुनाव जिताने का माद्दा है और उन्होंने मप्र की राजनीति को एक दिशा दी है बल्कि इस बार फोकस किसानों की उन्नति और खेती को फायदा का धंधा बनाने के उनके सपने को काफी हद तक साकार करने पर रहेगा। 10 साल पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही मप्र के किसानों के लिए काम में आने वाले उपकरणों में सबसिडी देने के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ था उसने नियम-कानून में बदलाव, खाद-बीज की अग्रिम सुविधा और समस्याओं के समाधान में विशेष रुचि लेते हुए फसल बीमा योजना का जो मिशन चुनौती के तौर पर लिया था वो मप्र में मील का पत्थर साबित होती इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार ने उनके अनुभव और सिफारिशों की दम पर बीमा योजना की जो लॉचिंग की उसने शिवराज के साथ मप्र को भी सुर्खियों में ला दिया है। यूं तो मोदी सरकार की कई योजनाएं चर्चा में आईं लेकिन उसकी सफलता पर सवाल भी खड़े किए गए। लेकिन बेरोजगार युवकों के लिए स्टार्टअप योजना के बाद सबसे ज्यादा चर्चा फसल बीमा योजना की है जिसकी ऐलान के बाद यदि मोदी भोपाल में इस कार्यक्रम में शिरकत करने आ रहे हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि मकसद बीमा योजना से ज्यादा शिवराज को ऐसे किसान नेता के तौर पर स्थापित करने की है जिसका लाभ मप्र के साथ आने वाले समय में चुनाव वाले राज्य खासतौर से उत्तरप्रदेश ही नहीं देश में बीजेपी को मिल सके। अभी तक बीजेपी में किसान नेता के तौर पर राजनाथ सिंह की गिनती होती थी। जिस समिति ने फसल बीमा योजना को अंतिम रूप दिया उसने बीजेपी के मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान को शामिल किया जाना भी एक अहम कड़ी मानी जाएगी। शिवराज ने मोदी के दौरे के ऐलान से पहले यदि सीएम हाउस पर प्रदेश के चुनिन्दा किसानों को सम्मानित कर पूरे प्रदेश के किसानों को लगातार चौथी बार मिले कृषि कर्मण पुरस्कार का श्रेय जिस तरह दिया उसे भी बीजेपी की नई रणनीति से जोड़कर देखना होगा। एक दिन पहले ही संघ के पदाधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान, संगठन महामंत्री अरविन्द मेनन के साथ प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे की मौजूदगी में जिन ज्वलंत मुद्दों पर लंबा मंथन कर चुके उसमें किसान के साथ मोदी के प्रस्तावित दौरे की सफलता सुनिश्चित करना भी शामिल था। यहां याद रखना होगा कि शिवराज सिंह चौहान ने यदि किसानों को बहुत कुछ दिया तो खेती को फायदे का धंधा बनाने के अपने मिशन को लेकर वो हमेशा संजीदा नजर आए तो उन्हें लगातार चुनाव जिताकर मुख्यमंत्री बनाए रखने में किसानों के वोट बैंक ने बीजेपी पर भरोसा भी जताया है। बावजूद इसके प्राकृतिक आपदा से पीड़ित किसानों को जब राहत नहीं मिली तो उनकी नाराजगी भी उन्हें खूब झेलना पड़ी वह बात और है कि कृषि कैबिनेट से लेकर कृषि मंथन और उसके पहले कृषि पंचायत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जब मोदी की अपनी सरकार से मुआवजा नहीें मिला तो चिंतन-मंथन की एक लंबी एक्सरसाइज के दौरान िकसानों की तकलीफ जानने के लिए वल्लभ भवन में बैठे अफसरों को भी मैदान में उतार दिया था। ऐसे में जब जम्बूरी मैदान के मंच पर नमो-शिवाय की जोड़ी किसानों को लुभाने के साथ एक-दूसरे की तारीफ में कसीदे कढ़ते हुए जब नजर आएगी तब एक नई बहस छिड़ना भी तय है। बहस पीएम मोदी के 10 साल के सीएम शिवराज से बनते बिगड़ते रिश्तों पर एक नई बहस को लेकर ही नहीं होगी बल्कि पुराने कयासों की याद भी ताजा की जाएगी। चाहे फिर वो नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद शिवराज को मप्र से हटाकर दिल्ली लाए जाने की अटकलें हों या फिर उन्हें केंद्र में मंत्री बनाए जाने की। इस बीच जब कैलाश विजयवर्गीय को अमित शाह ने राष्ट्रीय महासचिव बनाया तो चौहान के कमजोर होने की खबरें भी चर्चा का विषय बनी जिस पर शिवराज ने नंदकुमार सिंह चौहान को निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सामने लाकर विराम ही नहीं लगाया बल्कि ये संदेश भी दे दिया कि मोदी और शाह को आज भी उन पर भरोसा है। शाह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने में मप्र की भूमिका जब अलग नजर आई और शिवराज ने अपने चहेतों को लालबत्ती से नवाजा तो संकेत साफ तौर पर चला गया कि मोदी और शाह ही नहीं संघ भी शिवराज को फ्री हैंड दे चुका है। अब जब मोदी खुद मप्र का रुख कर रहे हैं तो इसे शिवराज की मजबूती की एक नई कड़ी के तौर पर देखा जाएगा। मोदी चाहते तो फसल बीमा योजना को लेकर अपनी सरकार की वाहवाही दिल्ली में बैठकर ही लूट सकते थे या फिर वो खेती किसानी के लिए पहचाने जाने वाले पंजाब का रुख भी कर सकते थे जहां चुनाव नजदीक हैं। संदेश साफ है कि शिवराज को बड़े किसान नेता के तौर पर स्थापित किया जा रहा है और इसमें संघ की बड़ी भूमिका है। शिवराज ने मुख्यमंत्री रहते यदि प्रदेश को चार बार कृषि कर्मण पुरस्कार दिलवाया है और वो भी उसकी शुरूआत यदि यूपीए की मनमोहन सरकार के दौरान हुई थी तो फिर कोई तो बात है इस चौहान ने। जिस चौहान ने यूपीए के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलकर किसानों की लड़ाई मुख्यमंत्री रहते लड़ी थी। फिर भी यहां सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर एक सीएम रहते हुए यदि शिवराज को किसान नेता बनाने का फैसला बीजेपी और संघ ने लिया है तो आखिर इसकी वजह क्या है? बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि यदि इसमें मोदी से ज्यादा रुचि संघ की है तो क्या पूंजीपतियों के हिमायती, हाईप्रोफाइल, ग्लोबल नेता नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने के बाद क्या संघ को एक लोप्रोफाइल और ऐसे किसान नेता की जरूरत महसूस हो रही है जो बीजेपी की राजनीति में संतुलन स्थापित कर सके क्योंकि भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी सरकार को किसान के आक्रोश के कारण ही बैकफुट पर आना पड़ा था।

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