रीवा : ना साबुन खर्च हुआ ना पानी-निर्मल हो गई जनपद पंचायत सिरमौर
रीवा : रीवा जनपद पंचायत सिरमौर अंतर्गत 90 % पंचायतों मे अभी भी 50% शौचालयों का निर्माण कार्य अधूरा है ।उसमे भी 10% स्वयं के ब्यय से बनवाए गए शौचालयों को छोड़ दिया जाय तो 40% का अभी तक उद्घाटन भी नही किया गया है ,ग्रामीण क्षेत्र मे अभी भी 90% आवादी खुले मे शौच क्रिया करते हुए देखी जा सकती है ।और तो और यदि किसी सम्भ्रान्त ब्यक्ति का नाम लेना जरूरी न समझा जाय तो ऐसे लोग भी शामिल हैं जो स्वच्छ भारत मिशन मे बढ़चढ कर हिस्सा लेते हैं ,खुले मे शौच का विरोध करते हैं ,स्वयं खुले मे शौच करते हैं ।स्वच्छता प्रेरकों की उपयोगिता मीटिंग तक और नेताओं की उपयोगिता भाषण देने तथा हांथ मे झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने तक है ।अफसरों की उपयोगिता झूंठे आंकड़े प्रस्तुत कर ओडीएफ का प्रशस्ति प्रमाण पत्र लेने तक सीमित है ।कम से कम सिरमौर जनपद पंचायत मे यही हुआ है ।
न हितग्राहियों को शौचालय की राशि देनी पड़ी ,न शौचालय बनवाने पड़े ।तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने कलेक्टर से अपनी पीठ ठोकवाने के लिए और कलेक्टर ने मुख्य मंत्री से अपनी पीठ ठोकवाने के लिए झूंठी रिपोर्ट प्रस्तुत कर जनपद पंचायत को निर्मल घोषित कराकर प्रशस्ति प्रमाण पत्र ले लिया ।
ऐसे हुआ खेल -
जनपद पंचायत के तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी दया शंकर सिंह पर निरंतर ऊपर से दबाव पड़ रहा था कि चाहे जैसे हो जनपद को निर्मल घोषित कराओ ।उन्होने पोर्टल से उन लोगो का नाम ही हटवा दिया जिनके शौचालय नही बने थे ।जो बने थे उसी के आधार पर शत प्रतिशत शौचालय दिखाकर जनपद पंचायत को मुख्यमंत्री की अंतरैला मीटिंग मे ओडीएफ करा लिया ।प्रशस्ति पत्र लेकर पीठ भी ठोकबा लिया ।
खामियाजा भुगत रहे हितग्राही -
अब चूंकि सिरमौर को निर्मल जनपद पंचायत का प्रमाण पत्र माननीय मुख्यमंत्री के कर कमलों द्वारा मिल चुका है अत: जो हितग्राही बाद मे इस लालच से शौचालय बनवाकर शासन द्वारा देय राशि की मांग किया तो उन्हे भटकाया जा रहा है ।जब इनका नाम ही पोर्टल से गायब है तो निर्मल पंचायत मे नए शौचालय के लिए प्रावधान ही नही है ।शौचालय निर्माण के लिए मनरेगा से भी भुगतान बंद किया जा चुका है ।
सरकारी शौचालयों की हकीकत पूर्व मे सरकारी एजेंसियों द्वारा बनवाए गए शौचालयों की जांच कराई जाय तो घोटालों के क्रम मे एक और शौचालय घोटाला जुड़ जाएगा ।पहली विसंगति जो देखने को मिलेगी वह यह कि जमीन के अभाव मे हरिजन आदिवासियों के मुख्य दरवाजे पर ही शौचालय बनवा दिए गए हैं ।स्वाभाविक है कि प्रवेश द्वार मे वने शौचालय का उपयोग करने मे हिचकिचाहट होगी ।लोगों की माने तो दूसरी विसंगति यह है कि शौचालय इतने संकरे है कि लोग आराम से बैठकर शौच क्रिया नही कर सकते ।विना उपयोग किए ही दरवाजे और शीट टूट जाने की बात भी लोग करते हैं ।
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