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प्रमोशन में आरक्षण का मामला, अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ करेगी सुनवाई



भोपाल। पदोन्नति में आरक्षण रद्द किए जाने संबंधी मध्य प्रदेश, त्रिपुरा और बिहार के मामलों को अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनेगी। सुप्रीम कोर्ट की युगल पीठ ने मंगलवार को ये फैसला सुनाया है। मध्य प्रदेश सरकार और पदोन्नति में आरक्षण की मांग को जायज ठहराने वाले मप्र अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) सहित राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट से बार-बार यह मांग कर रही थी कि इस मामले की सुनवाई का अधिकार सिर्फ संविधान पीठ को ही है।

गौरतलब है कि अप्रैल 2016 में मप्र हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएम खानविलकर ने 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) अधिनियम 2002" को खारिज कर दिया था। साथ ही ये भी निर्देश दिए थे कि इस अधिनियम के तहत पदोन्नत सभी अधिकारियों-कर्मचारियों की पदावनति की जाए। इसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उल्लेखनीय है कि डेढ़ साल से सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई कर रहा है। इस बीच प्रदेश में 55 हजार से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं। जिसमें से 22 हजार ऐसे अधिकारी-कर्मचारी हैं, जो डीपीसी होने के ठीक पहले या बाद में रिटायर हुए हैं।

क्या चाहता है अजाक्स

अजाक्स ने वर्ष 2006 में एम. नागराज प्रकरण में आए फैसले पर सवाल उठाते हुए क्रीमीलेयर को संवैधानिक रूप से परिभाषित करने की मांग की है। नागराज मामले में कोर्ट ने अजा-अजजा वर्ग को पदोन्न्ति में आरक्षण का लाभ देने से पहले व्यक्ति विशेष का पिछड़ापन (जिसे पदोन्नति दी जाना है उसके परिवार की आर्थिक स्थिति), जिस पद पर पदोन्नत किया जा रहा है वहां रिक्त पद और कर्मचारी की कार्यकुशलता देखने को कहा था।

इस फैसले के क्या मायने होंगे

कर्मचारी-अधिकारियों के लिए ...

- पदोन्नति पर रोक जारी रहेगी, क्योंकि प्रदेश में अभी पदोन्नति के लिए कोई नियम नहीं है।

- जब तक संविधान पीठ का फैसला नहीं आता है, तब तक पदोन्नति नहीं होगी और अधिकारी-कर्मचारी रिटायर होते रहेंगे।

- जब तक संविधान पीठ का फैसला नहीं आता है, तब तक सरकार नए पदोन्नति नियम भी नहीं बना सकती है। पदोन्न्ति जारी रखने के लिए भी संविधान पीठ से अनुमति लेना होगी।

फैसला किसके हित में...

- अजाक्स और राज्य सरकार मामले को टालने के लिए लगातार संविधान पीठ को सौंपने की मांग करती रही है। मामला टलने से पदावनति नहीं होगी।

- सपाक्स, सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संस्था आर्थिक रूप से कमजोर है और इस फैसले के बाद उसे लंबी लड़ाई लड़ना पड़ेगी। इसके लिए संस्था को आर्थिक स्थिति सुधारना पड़ेगी।

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