छत्तीसगढ़ से विलुप्त हो रहीं 'मोंगरी' मछलियां
रायपुर। छत्तीसगढ़ के किसान धान के साथ-साथ अतिरिक्त आय का जरिया बनी 'मोंगरी' मछली के विलुप्त होने से काफी चिंतित हैं। सरकार भी विलुप्त होती इस मछली के प्रजाति के संरक्षण के लिए कोई ठोस पहल नहीं कर रही है। इसके चलते सूबे के ग्रामीणों इलाकों में चाव से खाए जानेवाली मछली मोंगरी खेतों और पोखरों से पूरी तरह गायब दिख रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इसके लिए मौसम और खेती के तौर तरीकों में आये परिवर्तन को जिम्मेदार मानते हैं। गौरतलब है कि सूबे के कुछ ग्रामीण इलाकों में धान के सीजन में खेतों से नैसर्गिक रुप में मोंगरी मछली उत्पन्न होती थी। जो किसानों के खुद के खाने के साथ-साथ बाजारों में बिक्री के लिए भी आती थी और किसानों को अतिरिक्त आय हो जाया करती थी। मोंगरी मछली का क्रेज ऐसा था कि राज्य के अन्य स्थानों में रहने वाले किसानों के रिश्तेदार इसका लुत्फ उठाने उन इलाकों में जाया करते थे, जहां ये मछलियां बहुतायत में पाई जाती थी।
बताया जाता है कि अन्य मछलियों की तरह मोंगरी मछली का पालन नहीं किया जा सकता है, धान के खेतों में स्थानीय जलवायु में इसका प्रजनन स्वत: ही हो जाता है। प्रत्येक मछली का वजन 300 से 650 ग्राम तक का होता है। यह खाने में स्वादिष्ट और लाभकारी भी होता है। सूबे के बेमेतरा जिले के स्थानीय किसान रामरतन साहू ने वीएनएस को बताया कि वे अपने खेत से मिलने वाली मोंगरी मछली को आज से आठ से दस साल पहले सस्ते के जमाने में सीजन वाले प्रत्येक सीजन बाजार में बारह सौ से पंद्रह सौ रुपये तक अतिरिक्त कमाई किया करते थे, पर अब खेतों में उनका नामोनिशान मौजूद नहीं है। रामरतन का कहना है कि मोंगरी मछली की विलुप्तता के कारण का पता लगाना ही प्राथमिकता होनी चाहिए और जो भी कारक इसकी विलुप्तता के लिए जिम्मेदार पाए जाएं उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सिमगा निवासी छुतु यादव अपने बचपन के दिनों को याद करते कहते हैं कि उनके खेत के एक कोने में तीन से चार फुट के गड्ढे में काफी मात्रा में मोंगरी मछली हुआ करती थी, पर अब तो पोखरों में केवल पानी ही जमा होता है। धमतरी निवासी घनश्याम बताते हैं कि मोंगरी तो लगभग विलुप्त ही होने वाली है, उसके साथ-साथ हिमोग्लोबिन वर्धक बामिन मछली की कम होती आवक भी चिंता का विषय है, साथ ही बजलू मछली का अस्तित्व भी खतरे में दिख रहा है। ज्यादातर इलाकों में ये सिज्नेबल मछलियां विलुप्ति के कगार पर हैं। पर्यावरणविद् प्रमोद शर्मा इसके पीछे खेती के आधुनिक तौर तरीकों को ही जिम्मेदार मानते हैं, उनका कहना है कि किसान खाद और कीटनाशक का ज्यादा उपयोग करने लगे हैं, इसके चलते मोंगरी मछली के प्रजनन पर असर पड़ा है। प्रदेश में पिछले एक दशक से मोंगरी मछली के उत्पादन में लगातार गिरावट आई है। ये तीनों मछली ग्रामीणों के साथ-साथ बेमेतरा, दुर्ग, धमतरी,नारायणपुर जिले के साथ साथ राजधानी में भी काफी लोकप्रिय है। इनकी कम होती जनसंख्या पर किसी भी सरकारी विभाग ने चिंता नहीं दिखाई है और न ही विलुप्त होने का कारण जानने की कोशिश भौगोलिक, जैविक अमले और एनजीओ कर रहे हैं। किसान कहते हैं कि विदेशी चैनलों ने सेव टाइगर का नारा दिया तो पूरा देश बाघ बचाने निकल पड़ा। जिस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए बाघ जरूरी है उसी प्रकार से मछलियां भी तो जरूरी हैं और केवल मछली ही नहीं, सभी प्रकार के प्राणियों के संरक्षण से ही हमारा पारिस्थितिक तंत्र बचा रह सकता है।
बताया जाता है कि अन्य मछलियों की तरह मोंगरी मछली का पालन नहीं किया जा सकता है, धान के खेतों में स्थानीय जलवायु में इसका प्रजनन स्वत: ही हो जाता है। प्रत्येक मछली का वजन 300 से 650 ग्राम तक का होता है। यह खाने में स्वादिष्ट और लाभकारी भी होता है। सूबे के बेमेतरा जिले के स्थानीय किसान रामरतन साहू ने वीएनएस को बताया कि वे अपने खेत से मिलने वाली मोंगरी मछली को आज से आठ से दस साल पहले सस्ते के जमाने में सीजन वाले प्रत्येक सीजन बाजार में बारह सौ से पंद्रह सौ रुपये तक अतिरिक्त कमाई किया करते थे, पर अब खेतों में उनका नामोनिशान मौजूद नहीं है। रामरतन का कहना है कि मोंगरी मछली की विलुप्तता के कारण का पता लगाना ही प्राथमिकता होनी चाहिए और जो भी कारक इसकी विलुप्तता के लिए जिम्मेदार पाए जाएं उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सिमगा निवासी छुतु यादव अपने बचपन के दिनों को याद करते कहते हैं कि उनके खेत के एक कोने में तीन से चार फुट के गड्ढे में काफी मात्रा में मोंगरी मछली हुआ करती थी, पर अब तो पोखरों में केवल पानी ही जमा होता है। धमतरी निवासी घनश्याम बताते हैं कि मोंगरी तो लगभग विलुप्त ही होने वाली है, उसके साथ-साथ हिमोग्लोबिन वर्धक बामिन मछली की कम होती आवक भी चिंता का विषय है, साथ ही बजलू मछली का अस्तित्व भी खतरे में दिख रहा है। ज्यादातर इलाकों में ये सिज्नेबल मछलियां विलुप्ति के कगार पर हैं। पर्यावरणविद् प्रमोद शर्मा इसके पीछे खेती के आधुनिक तौर तरीकों को ही जिम्मेदार मानते हैं, उनका कहना है कि किसान खाद और कीटनाशक का ज्यादा उपयोग करने लगे हैं, इसके चलते मोंगरी मछली के प्रजनन पर असर पड़ा है। प्रदेश में पिछले एक दशक से मोंगरी मछली के उत्पादन में लगातार गिरावट आई है। ये तीनों मछली ग्रामीणों के साथ-साथ बेमेतरा, दुर्ग, धमतरी,नारायणपुर जिले के साथ साथ राजधानी में भी काफी लोकप्रिय है। इनकी कम होती जनसंख्या पर किसी भी सरकारी विभाग ने चिंता नहीं दिखाई है और न ही विलुप्त होने का कारण जानने की कोशिश भौगोलिक, जैविक अमले और एनजीओ कर रहे हैं। किसान कहते हैं कि विदेशी चैनलों ने सेव टाइगर का नारा दिया तो पूरा देश बाघ बचाने निकल पड़ा। जिस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए बाघ जरूरी है उसी प्रकार से मछलियां भी तो जरूरी हैं और केवल मछली ही नहीं, सभी प्रकार के प्राणियों के संरक्षण से ही हमारा पारिस्थितिक तंत्र बचा रह सकता है।

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