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RTI से खुलासा, हिंदी देश की राष्ट्रभाषा नहीं..!

लखनऊ। भारत में अधिकांश लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं। देश की सर्वाधिक जनसंख्या हिंदी समझती है और अधिकांश हिंदी बोल लेते हैं। लेकिन यह भी एक सत्य है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है ही नहीं। लखनऊ की सूचना अधिकार कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा को सूचना के अधिकार के तहत भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा मिली सूचना के अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की 'राजभाषा' यानी राजकाज की भाषा मात्र है। भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है।
साल 1947 से वित्तीय वर्ष 2012-13 तक देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी देने के लिए उर्वशी शर्मा की सूचना की अर्जी प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, राजभाषा विभाग से मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, केंद्रीय हिंदी संस्थान मैसूर और केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली के जन सूचना अधिकारियों के पास लंबित है।

उर्वशी के अनुसार यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली भारत सरकार सात महीनों बाद भी देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी नहीं दे पाई है। साल 1947 से वित्तीय वर्ष 2012-13 तक विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी देने के लिए उर्वशी शर्मा की सूचना की अर्जी प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, राजभाषा विभाग से विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से वित्त मंत्रालय को स्थानांतरित की जा रही है।

विदेश मंत्रालय के निदेशक मनीष प्रभात द्वारा 21 फरवरी को लिखे पत्र के अनुसार वर्ष 1947 से वित्तीय वर्ष 1983-84 तक विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी भारत सरकार के पास नहीं है। उर्वशी का कहना है कि यह दुखद है कि हिंदी के नाम पर वक्तव्य देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानने वाली भारत सरकार के पास विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार की 36 वर्षो की कोई जानकारी ही नहीं है।

भारत सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 1984-85 से वित्तीय वर्ष 2012-2013 की अवधि में विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार द्वारा सबसे कम 5,62,000 रुपये वर्ष 84-85 में और सर्वाधिक 68,54,8000 रुपये वर्ष 2007-08 में खर्च किए गए। वर्ष 2012-13 में इस मद में अगस्त 2012 तक 50,00,000 रुपये खर्च किए गए थे। भारत सरकार के इस खुलासे से आहत उर्वशी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और विदेशों में इसके प्रचार-प्रसार के लिए बजटीय आवंटन की वृद्धि के लिए संघर्ष करने के लिए खुद को कृतसंकल्प बताया।

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