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नहीं रहे मशहूर गायक मन्ना डे, बैंगलोर में ली आखिरी सांस

मुंबई । प्रबोध चन्द्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म एक मई 1920 को कोलकाता में हुआ था। डे के पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, लेकिन उनका रुझान संगीत की ओर था और वह इसी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहते थे। डे ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा केसी डे से हासिल की।डे के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे, तभी बादल खान ने डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा यह कौन गा रहा है। डे को जब बुलाया गया, तो उन्होंने अपने उस्ताद से कहा कि बस ऐसे ही गा लेता हूं, लेकिन बादल खान ने डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे।
       
डे 40 के दशक में चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपनेसपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गये। वर्ष 1943 में फिल्म तमन्ना में बतौर पार्श्र्वगायक उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस में गा चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि यही एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था।शुरुआती दौर में डे की प्रतिभा को पहचानने वालों में संगीतकार शंकर-जयकिशन का नाम सबसे ऊपर है। इस जोड़ी ने डे से अलग-अलग शैली में गीत गवाये। उन्होंने डे से 'आ जा सनम मधुर चांदनी में हम' जैसे रुमानी गीत और 'केतकी गुलाब जूही' जैसे शास्त्रीय राग पर आधारित गीतों को आवाज दिलाई। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में डे ने 'केतकी गुलाब जूही' गीत गाने से मना कर दिया था।
       
संगीतकार शंकर-जयकिशन ने जब डे को 'केतकी गुलाब जूही' गीत गाने की पेशकश की, तो पहले वह इस बात से घबरा गये कि भला वह महान शास्त्रीय संगीतकार भीमसेन जोशी के साथ कैसे गा पाएंगे। डे ने सोचा कि कुछ दिनों के लिए मुंबई से दूर पुणे चला जाए। बात जब पुरानी हो जायेगी, तो वह वापस मुंबई लौट आएंगे और उन्हें भीमसेन जोशी के साथ गीत नहीं गाना पड़ेगा, लेकिन बाद में उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और 'केतकी गुलाब जूही' गीत को अमर बना दिया।
       
वर्ष 1950 में संगीतकार एसडी बर्मन की फिल्म मशाल में डे को 'ऊपर गगन विशाल' गीत गाने का मौका मिला। फिल्म और गीत की सफलता के बाद बतौर पार्श्र्वगायक वह अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। डे को अपने कैरियर के शुरुआती दौर में अधिक शोहरत नहीं मिली। इसकी मुख्य वजह यह रही कि उनकी सधी हुई आवाज किसी गायक पर फिट नहीं बैठती थी। इसी कारण से एक जमाने में वह हास्य अभिनेता महमूद और चरित्र अभिनेता प्राण के लिए गीत गाने को मजबूर हुये थे।
      
वर्ष 1961 मे संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के निर्देशन में फिल्म 'काबुली वाला' की सफलता के बाद डे शोहरत की बुंलदियो पर जा पहुंचे। फिल्म काबुली वाला में उनकी आवाज में प्रेम धवन रचित यह गीत 'ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन' आज भी श्रोताओं की आंखो को नम कर देता है।प्राण के लिए उन्होंने फिल्म उपकार में 'कस्मे वादे प्यार वफा' और जंजीर में 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी' जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म पडोसन में हास्य अभिनेता महमूद के लिए 'एक चतुर नार' गीत गाया, तो उन्हें महमूद की आवाज समझा जाने लगा। 
       
आमतौर पर पहले माना जाता था कि डे केवल शास्त्रीय गीत ही गा सकते हैं, लेकिन बाद में उन्होंने 'ऐ मेरे प्यारे वतन', ,ओ  मेरी जोहरा जबीं', 'ये रात भीगी भीगी', 'ना तो कारवां की तलाश है' और 'ए भाई जरा देख के चलो' जैसे गीत गाकर अपने आलोचकों का मुंह सदा के लिए बंद कर दिया।प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन ने मन्ना डे के बारे में कहा था कि मन्ना डे हर रेंज में गीत गाने में सक्षम है। जब वह ऊंचा सुर लगाते हैं, तो ऐसा लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है, जब वह नीचा सुर लगाते हैं, तो लगता है उसमें पाताल जितनी गहराई है और यदि वह मध्यम सुर लगाते हैं, तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है।
डे के पार्श्र्वगायन के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि डे हर वह गीत गा सकते हैं, जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाये हों, लेकिन इनमें कोई भी डे के हर गीत को नहीं गा सकता है। इसी तरह आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने एक बार कहा था कि आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं, लेकिन यदि मुझसे पूछा जाये तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूं।डे केवल शब्दों को ही नहीं गाते थे, अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति 'मधुशाला' को स्वर देने के लिये डे का चयन किया।
       
डे को फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1971 में पद्मश्री पुरस्कार और वर्ष 2005 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वह वर्ष 1969 में फिल्म 'मेरे हुजूर' के लिये सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक, 1971 में बंगला फिल्म 'निशि पदमा' के लिये सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किये गये।डे के संगीत के सुरीले सफर में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुये वर्ष 2007 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डे ने अपने पांच दशक के कैरियर में लगभग 3500 गीत गाये।करोडों संगीत प्रेमियों के हृदय सम्राट डे ने आज तड्के बंगलुरु के नारायण हृदयालय में अंतिम सांस ली। उन्हें सांस लेने में तकलीफ के साथ ही गुर्दे की बीमारी भी थी।

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