47 वां लोक व्याख्यान संपन्न, औपनिवेशिक मानसिकता पर प्रोफेसर ज्ञान वर्धन पाठक का व्याख्यान
स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी में आज प्रज्ञा प्रवाह के सहयोग से एक लोक व्याख्यान का आयोजन किया गया । मासिक लोक व्याख्यानों की श्रंखला के इस 47 वें व्याख्यान का विषय था - “औपनिवेशिक मानसिकता से भारतीय मानस की मुक्ति “ । कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रोफेसर ज्ञान वर्धन पाठक थे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता नेशनल लॉं इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी भोपाल की प्रोफेसर राका आर्य ने की ।
कार्यक्रम का विवरण इस प्रकार है :-
कार्यकम का नाम – पब्लिक लेक्चर
विषय – औपनिवेशिक मानसिकता से भारतीय मानस की मुक्ति
दिनांक – 9 अप्रैल 2017
स्थान – स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी
वक्ता – प्रोफेसर ज्ञान वर्धन पाठक
अध्यक्षता – प्रोफेसर राका आर्य
लेक्चर की प्रमुख बातें :-
प्रोफेसर ज्ञान वर्धन ने कहा
· यदि आप ब्रिटिश उपनिवेशवाद को अच्छे से समझना चाहते हैं तो शशि थरूर की अभी हाल में प्रकाशित हुई किताब “इरा ऑफ डार्कनेस” पढ़ें जिसमें उन्होने ब्रिटिश औपनिवेशक हथकंडों के बारे में विस्तार से लिखा है
· कार्ल मार्क्स कहते थे कि “ पूंजीवाद की उच्चतर अवस्था उपनिवेशवाद है “ अर्थात किसी देश में पहले पूंजीवाद आता है , अर्थात औद्योगिक क्रांति आती है और फिर उसके बाद वह देश उपनिवेश बनाता है
· पर हमारे मामले में यह प्रक्रिया उल्टी हुई । पहले 1757 में अंग्रेजों ने भारत को उपनिवेश बनाया उसके बाद भारत से मिले धन का इस्तेमाल कर 1760 में इंग्लैंड का औद्योगिकीकरण शुरू किया
· इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अंग्रेजों ने अपने शासन के शुरुआती 38 वर्षों में ही लगभग 200 मिलियन पाउंड की राशि इंग्लैंड भेजी । इसी राशि से उन्होने वहाँ उद्योगों की स्थापना की । क्योंकि उस समय की इंग्लैंड की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वे बड़े बड़े उद्योग लगा पाते
· 1757 में अंग्रेजों ने बंगाल जीता था तो उसने लिखा कि ये देश तो स्वर्ग के समान है मैंने अपनी ज़िंदगी में इतना समृद्ध देश नहीं देखा ।
· जब अंग्रेज़ भारत आए तो विश्व की जीडीपी में भारत का हिस्सा 23 % था और इंग्लैंड का केवल 1.8% । 200 वर्षों के अङ्ग्रेज़ी शासन के बाद 1947 में विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा घटकर 1.8% हो गया , ये था औपनिवेशिक शासन का असर
· अंग्रेजों ने भारत आते ही ये पाँच काम किए
1. भारतीय राजाओं को समझा कर उन्हें इस चीज़ के लिए मनाया कि “ आपको सेना रखने की जरूरत नहीं है बिना सेना रखे भी तुम्हारा राजपाट कायम रहेगा” इस तरीके से उन्होने हमारी ताकत छीन ली
2. उन्होने भारतीय शासकों को बहला फुसलाकर उनसे व्यापारिक अधिकार ले लिए , जिसके कारण वे आगे चलकर भारतीय व्यापार को वे नियंत्रित करने लगे । इससे उन्होने हमारा लाभ छीन लिया
3. उन्होने दोषपूर्ण व्यापारिक व टैक्स नीति अपनाकर भारतीय कारीगरों व दस्तकारों का हुनर छीन लिया
4. उन्होने हिन्दू व मुसलमान को लड़ाकर एक समाज के रूप में हमें कमजोर कर दिया
5. उन्होने ग्रामीण भारत में सदियों से मौजूद शिक्षा प्रणाली को खत्म करने के राजाज्ञाएँ जारी की और ब्राह्मणो को समाज का दुश्मन बता दिया
· पर सबसे बड़ी गलती हमने आज़ादी के बाद की जब हमने उनके द्वारा दिये गए इतिहास को सही माना लिया और उसी को पढ़ाना शुरू कर दिया । जबकि असल में ये इतिहास अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए तैयार किया था
· इतिहास असल में समाज की स्मृति होती है । जिस प्रकार यदि किसी व्यक्ति की स्मृति छीन ली जाए तो वह इधर उधर भटकता रहता है और दर दर की ठोकरें खाता है और दुनिया उसे पागल घोषित कर देती है । इतिहास , अर्थात स्मृति छिन जाने से भारतीय समाज की भी यही हालत हो गयी है
· आज हमारे देश में अलगु अधिकांश कानून औपनिवेशिक है जो अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए बनाए थे पर शर्म की बात है कि हम उन क़ानूनों को आज भी बनाए हुए हैं और उनका बड़ी बेशर्मी से बचाव भी करते हैं
· भारत का वर्तमान प्रशासनिक ढांचा भी औपनिवेशक मानसिकता से संचालित होता है जहां हर किसी को बस हुक्म मानने के लिए तैयार किया जाता है ।
· स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र हमारे खून में होता है । यह धारणा कि अंग्रेजों ने हमें लोकतन्त्र सिखाया सरासर झूँठ है
· यदि आप असली भारतीय इतिहास पढ़ना चाहते हैं तो आपको पर्सिअन, अरेबिक और फ्रेंच सीखनी पड़ेगी । क्योंकि असली भारतीय इतिहास इन भाषाओं की किताबों में मौजूद है । इंग्लिश में जो इतिहास मौजूद है वह तो अंग्रेजों द्वारा अपनी सुविधा के लिए लिखवाया गया इतिहास है और हिन्दी में मौजूद इतिहास अङ्ग्रेज़ी इतिहास का अनुवाद है
प्रोफेसर राका आर्य ने कहा
· आज़ादी के 70 साल बाद भी यदि हम औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हैं और उससे संचालित हो रहे हैं तो उसमें गलती अंग्रेजों की नहीं बल्कि खुद हमारी है
· कोई शातिर कौम यदि आपको नीचा दिखाने के लिए अपने शासन काल में कोई तंत्र तैयारा करती है तो उसके जाने के बाद उसे खत्म करना हर स्वाभिमानी कौम की ज़िम्मेदारी होती है और हम यहाँ क्या कर रहे हैं हम तो उस तंत्र को आगे बढ़ाने में जी जान से जुटे हुए हैं
· मेरी पहचान मेरे लिए महत्वपूर्ण है इसलिए उसे मुझे ही खोजना होगा । आज के तकनीकी युग में आप यह काम आसानी से कर सकते हैं
· मेरी सलाह है कि कभी भी ओरिजनल को खोजने मत निकलिए, क्योंकि भारतीय सभ्यता या संकृति जैसी कोई चीज़ आपको कभी नहीं मिलेगी । समागम हमारी महान सभ्यता का हिस्सा रहा है हमें बाहरी तत्वों को अपने में अच्छे से समाहित कर चुकी असली भारतीय सभ्यता खोजने की जरूरत है
· पश्चिमीकरण का विरोध कीजिये , पश्चिम का नहीं ....क्योंकि जिस तरह पश्चिम ने हमारी कई अच्छी चीजों को अपनाया है वैसे ही हमें उनकी अच्छी चीजों से खुद को वंचित नहीं करना चाहिए

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