सद्गुरु के आदेश को उपदेश बनाकर जीवन में अपनाएं : निरंकारी प्रचारक सीताराम जी
राजकुमार पंत
निरंकारी सत्संग भवन में हुआ साप्ताहिक सत्संग
गुना, ब्यूरो । आध्यात्मिक धर्म का महत्व, मानव को शांतिपूर्वक रहकर प्रेम, प्यार, नम्रता वाला व्यवहार करना है। मनों में नफरत, घृणा मिटाकर भेदभाव वाली भावनाओं से ऊपर उठकर संसार में जीवन के सफर को तय करना है। इस एकत्व की भावनाओं से इंसान को इंसान के नजदीक लाकर मिलवर्तन की भावना को स्थापित किया जा सकता है। किसी जगह पर काफी समय से यदि अंधेरा हो रहा हो तो वहां पर प्रकाश को उजागर करने में कोई समय नहीं लगता। यदि अंधेरा भागने की युक्ति का पता हो, मोमबत्ती इत्यादि जलाकर मात्र एक क्षण में ही प्रकाश हो जाता है, इसी प्रकार निरंकारी बाबा हरदेव जी महाराज द्वारा जब इस ज्ञान को मन में बसाकर वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव के तन-मन-धन से प्राणी मात्र की सेवा की जाती है तो आध्यात्मिक धर्म की स्थापना हो जाती है यही नजारा इस सत्संग भवन में देखने को मिल रहा है।
उक्त उद्गार दलवी कॉलोनी स्थित संत निरंकारी भवन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान जबलपुर संगत से पधारे प्रचारक महात्मा श्री सीताराम जी ने संबोधित करते हुए व्यक्त किए। श्री सीताराम जी ने कहा कि अगर अंधेरा अपने कर्म से खुद को बदल सकता तो प्रकाश की आवश्यकता न होती। अगर किसी कर्म में भ्रम को मिटाया जा सकता तो कहना न पड़ता बह्मा की प्राप्ति भ्रम की समाप्ति। उन्होंने कहा कि पारस अपने कर्म से लोहे की तलवार को सोना तो सकता है मगर उसके कर्म मार-काट-धार को नहीं बदल सकता। जरूरत कर्म को बदलने की है। सद्गुरु मन बदल देता है, कर्म बदल जाता है। नामों से निकल कर नामी से जोड़ देता है। श्री सीताराम जी ने कहा कि मीरा को याद करें, कबीर जी को याद करें,अन्य भक्तों को याद करें, कोई ऐतराज नहीं। मगर अपने मिशन के महापुरूषों के इतिहास को भी पढ़े। सद्गुरु के आदेश को उपदेश बनाकर अपना लें।
सत्संग के उपरांत प्रचारक महात्मा श्री सीताराम जी अपने आठ दिवसीय प्रचारक यात्रा के दौरान गुना जोन के अंतर्गत आने वाले राघौगढ़, सागर, खुरई, बीना, विदिशा, गनयारी, ब्यावरा, उज्जैन, जावरा, खड़ावदा, नीमच, मनासा, रामपुरा, मंदसौर आदि संगतों को संबोधित करेंगे।


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