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युवाओं की एकजुटता और संघर्ष से बचेगा लोकतंत्र : मेधा पाटकर


भोपाल। तीन दिनों से चल रहे भोपाल जन उत्सव का मंगलवार को एक बड़ी रैली और आम सभा के साथ समापन हुआ। देश भर से आए सैकड़ों प्रतिनिधियों ने लोकतांत्रिक मूल्यों एवं वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने और असहमति के अधिकार के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया। प्रतिनिधियों ने देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर चिंता व्यक्त की और इसे बदलने के लिए युवा,मजदूर,किसान और आम जनता को एकजुट करने का आह्वान किया। पिछले तीन दिनों में लोगों ने भारत की बहुलतावादी संस्कृति की झलक देखी। सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मियों ने सामयिक मुद्दों पर प्रतिरोध की कलाओं का प्रदर्शन किया। विचार गोष्ठियों के माध्यम से महिला के खिलाफ हो रही हिंसा, शिक्षा पर नवउदारवादी एवं सांप्रदायिक हमले, वैज्ञानिक चेतना को खत्म करने की साजिशों के खिलाफ विमर्श किया गया। इन मुद्दों पर आम जन को जोड़कर लोकतांत्रिक मूल्यों एवं वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए आंदोलन करने की बात की गई।
इन नारों के साथ निकाली रैली
समापन से पहले एक बड़ी रैली निकाली गई। ''ना मजहब, ना कोई विधान, सबसे श्रेष्ठ संविधान''सबका देश, हमारा देश, भारत देश-भारत देश'' जैसे नारों के साथ रैली एक आम सभा में तब्दील हो गई। आम सभा को संबोधित करते हुए नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने कहा कि जन उत्सव में देश भर के बुद्धिजीवी मन की बात कहने नहीं आए हैं। यह सभी जन की बात कहने आए हैं। आज जनता हिंसा, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, विस्थापन से जूझ रही है। इनकी आवाज को उठाने के लिए सभी यहां इकट्ठा हुए हैं। आज विपरीत परिस्थितियों में भी निराशा नहीं है, बल्कि युवाओं ने आवाज को बुलंद किया है। उनकी एकजुटता और संघर्ष से लोकतंत्र बचेगा। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की राष्ट्रीय महासचिव मरियम ढवले ने कहा कि देश में औरतों पर यौन एवं सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी है। महिलाओं को उन ताकतों के खिलाफ संघर्ष करना होगा। बस्तर की आदिवासी नेत्री सोनी सोरी ने कहा कि कानून एवं संविधान का सही तरीके से पालन नहीं करने से महिलाओं, दलितों एवं आदिवासियों पर हिंसा हो रही है। सरकार जल, जंगल और जमीन को निजी कंपनियों को देने के लिए आदिवासी इलाकों में हिंसा कर रही है।

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