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रीवा : सूखी नहरों को पानी की दरकार-- इंतजार में किसान


राहुल तिवारी एमपी ऑनलाइन न्यूज़ संवाददाता
रीवा/जवा : विकास रुपी सपने के पीछे दौड़ते किसानों के कदम ताल सरकार के कदम ताल से मेल खा पाते की इसके बीच में प्रकृति ने समूचे तराई अंचल में सूखे का कहर ढाकर रोंक दिया।सरकार भी किसानों की कोई मदद न करनी पड़े शायद यही सोच कर सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित करने में जवा तहसील को भुला दिया ।परंतु तराई का किसान मदद नही सरकार और भगवान से पानी की दरकार रखता है।
हमारे जवा संवाददाता ने तराई अंचल के कई गाँवों में जाकर किसानो की भावनाओं एवं समस्याओं  को जानने का प्रयास किया तो सामने आया की किसान सरकार से अल्प मदद की वजाय सहयोग अवसर और पानी की अपेक्षा रखती है।टमस बहाव परियोजना के प्रारंभ होने के साथ तराई अंचल के किसानों को एक आस जगी थी कि पानी मिलेगा तो अच्छी फसलें होगी और हमारी माली हालत सुधरेगी।उस पर सरकारी यह दावा की 2018 में खेतों में पानी पहुँचा देंगे किसानों को स्वप्न लोक की सैर कराने लगा ।परंतु अब सूखे से तड़पते किसानों का भरोसा सरकारी वादे से डांवाडोल होने लगा है।
जवा तहसील की सात उद्वहन परियोजनाएँ जिनसे हजारों एकड़ भूमि सिंचित होती थी।सिंचाई विहीन गाँवों के किसानों की अपेक्षा उक्त उद्वहन परियोजनाओं की नहरों में सिंचित क्षेत्र के गाँवों के किसानों के विकास स्तर पर अंतर स्पष्ट दिखाई देता था।परंतु नहरों के निर्माण के नाम पर उद्वहन परियोजनाओं की सूखी  नहरें सूखे पर आंसू बहा रही हैं ।
कहने को तो प्रदेश सरकार के मुखिया खुद को किसान पुत्र कहते है परंतु तराई वासियो के लिए सरकार और सरकारी अमला किसानों के प्रति संवेदनहीन नजर आता है।जिस सरकार में वर्ष 2014- 15 में तराई अंचल की सात उद्वहन सिंचाई परियोजनाओं की मरम्मत के नाम पर लगभग एक करोड़ इक्कीस लाख रुपए खर्च किए थे वही सरकार और उसके अधिकारी कर्मचारी उद्वहन सिंचाई परियोजनाओं को चालू करने के लिए बीस बीस हजार रुपए जमा करने पर चालू करने की शर्त लगा रहे हैं ।योजनाओं दौरों नामकरणों में करोड़ों खर्च करनी वाली सरकार बीस हजार पर नहरें बंद रख रही है ।शायद यह सत्ता और सत्ता धारी दल के लिए सबसे शर्मिंदगी की बात होगी।
नहर विभाग के अधिकारी बकाया बिजली बिल की बात भी बात करते हैं । शायद यह भूल जाते है की बिजली पानी सब शासन व्यवस्था के अंग हैं ।विधायक --  सांसद विकास निधि भी जनता की है।अगर संवेदनशील का परिचय देते हुए तथाकथित बीस बीस हजार उक्त निधियों से सरकार या संवंधित जनता के कर्णधार जमा करा कर नहरें चालू करा देते तो शायद उक्त सातों उद्वहन सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित किसानों के सूखे चेहरों पर चमक आ जाती।और सूखी नहरों के पानी के इंतजार का समय समाप्त होकर नहरों की भी प्यास बुझ जाती।
तथा किसानों का भी पानी का इंतजार खतम होता।



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