पैर गंवाने के बावजूद मजबूत इरादों ने रामबाई को दिये हौसले रामबाई पैरों के बगैर करती है घर और खेती के काम
पैर गंवाने के बावजूद मजबूत इरादों ने रामबाई को दिये हौसले
रामबाई पैरों के बगैर करती है घर और खेती के काम
अनूपपुर/ प्रदीप मिश्रा -8770089979
10 वर्ष पूर्व रामबाई को जब जहरीले सांप ने दोनो पैर में जहर छोड़ा तो उसकी पूरी जिन्दगी ही बदल गई। गैगरीन बिमारी से पीड़ित मौत के मुह से तो वह बाहर निकल आई किंतु दोनों पैर जहर की वजह से खराब हो गये। लोगों की सहायता मिलने से पैर का ईलाज हुआ किंतु सड़न के कारण पैर कटवाने पड़ गये। रामबाई पति अमर सिंह गोंड़ 52 वर्ष ने ईलाज के बाद जीवन में आए कठिनाईयों से हार नहीं मानी और दोनों पैरों की लाचारी को अपने जीवन में कमजोरी नहीं बनाया। संर्घर्ष करते हुए वह घर के नजदीक खेतों में सब्जी का उत्पादन कर अपने परिवार का बेहतर भरण-पोषण पति के साथ मिलकर कर रही है। रामबाई जैतहरी विकासखण्ड के ग्राम पंचायत पंगना के बरटोला गांव की रहने वाली है। जिसने खुद को परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढाल लिया है। आज वह दूसरों के ऊपर आश्रित न होकर पूरे कार्य खुद कर रही है, जो वह सर्पदंश की घटना के पहले किया करती थी। गांव के निवासी रामबाई के हौंसले का लोहा मानते हैं। 42 वर्ष की आयु तक रामबाई गोंड़ अन्य महिलाओं की तरह गांव में घर और खेत के सारे कार्य कुशल तरीके से करती थी, लेकिन जनवरी 2007 की एक रात सोते समय रसलवाईपर जिसे जाड़ा सांप कहा जाता है ने दोनों पैर में डस लिया था। गरीबी और अशिक्षा के कारण रामबाई तब चिकित्सालय में ईलाज न कराकर देशी दवा गांव की कराई, लेकिन पैर ठीक नहीं हो पाया, बल्कि जहर दोनों पैरों को घुटने से नीचे तक सड़ाने लगा। उस समय गांव के सरपंच अमर सिंह व वर्तमान सरपंच बचन सिंह, पूर्व सचिव रामलखन पटेल को जानकारी हुई तो ग्रामसभा में रामबाई के ईलाज के लिए सभी ने निर्णय लिया। रामबाई को जिला चिकित्सालय अनूपपुर लाया गया, जहां डाॅ. एस.आर.पी. द्विवेदी एवं डाॅ. आर.पी. सोनी ने महिला की हालत को गंभीर पाया और पैर को काटना जरूरी बताया। कलेक्टर अनूपपुर द्वारा रामबाई को 10 हजार रु. की राशि स्वीकृत की गई और शहडोल जिला चिकित्सालय में सर्जन डाॅ. राजेश पाण्डेय ने रामबाई के दोनों सड़ चुके पैरों को अलग कर सफल आॅपरेशन किया। जिसके बाद धीरे-धीरे रामबाई के दोनों पैर ठीक हुए, लेकिन वह दोनों पैर खो चुकी थी। कुछ दिनों तक उसने पैरों के अभाव में कठिनाई भरा समय गुजारा, लेकिन खुद को मजबूत बनाते हुए वह घर के सारे काम करने लगी और पहले की भांति खेत पहुंचकर सब्जी लगाने का काम करने लगी। आज रामबाई अपने पैरों के न होने को कमजोरी न बनाकर दृढ़ इच्छा से विकलांगता को ध्यान में न रख 10 वर्ष पहले की तरह सफल जीवन गुजार रही है, जिसके हौसले का सम्मान गांव के लोग भी करते हैं। कई बार लोग ऐसी घटनाओं को जीवन का दुःखद पहलू मानकर अपने को निर्बल मानकर जीवन जी नहीं पाते हैं, लेकिन रामबाई ने यहां से अपने जीवन की एक नई शुरुआत की। वह आधे पैर को ही अपना सहारा मानकर बढ़ती जा रही है। रामबाई अब 52 वर्ष की हो चुकी है। वह डेढ़ एकड़ जमीन पर पति और बेटे के साथ मिलकर सब्जी लगाती है। रामबाई को सब्जी लगाने का ऐसा लगाव है कि वह यह कार्य पूरा अकेले कर रही है। रामबाई अन्य घरेलू काम घिसट-घिसटकर कर लेती है। ओखली में खुद धान कूटती है। बेटा व बहू होने के बावजूद रामबाई दूसरे पर निर्भर नहीं है। वह रबड़ के ट्यूब का टुकड़ा पीठ में बांधकर सामने लकड़ी का मुट्ठी बनाकर कहीं भी चली जाती है। रामबाई उम्र के दूसरे पड़ाव में है, लेकिन उसकी जीविटता ऐसी है कि वह अपनी विकलांगता को मजबूरी नहीं बनाई। जिसकी वजह से वह पैर खोने के बावजूद परिवार के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही है।

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