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पढ़ाई की उम्र में नैनिहाल बिन रहे कबाड़



पढ़ाई की उम्र में नैनिहाल बिन रहे कबाड़

अनूपपुर/राजेन्द्रग्राम:- प्रदीप मिश्रा सुनील गुप्ता 



पुष्पराजगढ़ तहसील क्षेत्र में सर्व शिक्षा अभियान की हकीकत देखने को हर दिन मिलती है जहां पढ़ाई लिखाई की इस उम्र में पढ़ाई का कार्य न करके गरीबी के चलते जगह जगह लगे कूड़ा दानों ढेर  में  कबाड़ बीनकर अपनी अपनी रोजी रोटी चला रहे है मालूम हो कि पढ़ने लिखने की इस छोटी सी उम्र में नैनिहाल हाथ मे खाली बोरी लेकर सुबह से कूड़ा  लगे ढेरो में  पहुंच कर कबाड़ का सामान खरीदना शुरू कर देते हैं हर जगह लगे कूड़े के ढेरों से जब कबाड़ एकत्र कर लेते हैं तो उसको कबाड़ की दुकान करने वाले कबाड़ी के यहां पहुंच कर उसको बेचकर घर के लिए खाने की सामग्री को ले जाते हैं तब कहीं भोजन का जुगाड़ बनता है यह इनका कार्य प्रतिदिन की दिनचर्या में है घर की गरीबी के कारण यह ननिहाल बच्चे स्कूलों का मुंह न देखकर सुबह से कूड़े के ढेरों में गंदगी भी रहती है लेकिन यह ननिहाल अपनी जिंदगी की परवाह न करके बल्कि इन लगे कूड़े के ढेरों में कबाड़ ढूंढते रहते हैं जबकि सरकार द्वारा इन नैनी वालों की शिक्षा के लिए जगह-जगह प्राथमिक विद्यालय की स्थापना भी है और जहां पर नहीं है वहां पर अपने विद्यालय की स्थापना भी की गई है विद्यालय की स्थापना भी की जा रही लेकिन उसके बाद भी ना पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चे सुबह से ही खाली बोरी लेकर कबाड़ के लिए निकल पड़ते हैं ऐसा दशा में इन नैनीताल का भविष्य चौपट हो रहा है और इन बच्चों को अपने भविष्य की कोई परवाह नहीं है तथा माता पिता भी ननिहाल के बारे में कुछ नहीं सोच रहे क्योंकि इन नैनीताल ओके चलते उनके घर का खर्च चल रहा है

नशे के आदि नैनिहाल
एक ओर जहां शासन  नशा मुक्ति के  करने के लिए योजना चलाकर नशा मुक्त देश बनाना चाहती है वही पुष्पराजगढ़ के नैनिहाल आजकल बोंफिक्श शराब गांजा बीड़ी सिगरेट तम्बाखू जैसे नशे का सेवन कर रहे है कि बार देखा गया है कि बच्चे स्कूल के नाम से घर से निकल नदी किनारे बैठ कर बोंफिक्श शराब के नशे लिप्त हो कर वही पड़े रहते बताया जाता है एज एक बच्चा  प्रतिदिन

हाथ मे कटोरा लेकर मामा की भांजिया मांग रही भीखएक ओर जहां मानीय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी मामा होने का दवा करते और कहते है कि में अपने भांजे भाजियों को हर सुविधा दूँगा क्या ये वोही सुविधा है कि हाथ मे  कॉपी पेन की जगह कटोरा ओर दर दर की ठोकरे खाकर भीख मांग करती है अपना पालन क्या यही वो योजना  है स्कूल चले हम  बच्चियो द्वारा बताया गया कि हम लोग बुढार के रहने वाले है और हम लोग बहोत गरीब है और हम लोगो के माँ पिता जी की हमेशा तबियत खराब रहती उनके इलाज के लिए पेस नही है तो हम लोग पढ़ने जाये कि कमाने तो हम लोग इसी तरफ भीख मांग कर अपना ओर अपने परिवार का पेट पालते हैं उन्होंने बताया कि उन्होंने की बार कोसिस की हम लोग पढ़े लेकिन उन मामा के भांजियों को कही भी कोई सुविधा नही मिली कि वो बच्चिया स्कूल जा सके

स्कूल चले हम अभियान पर करोड़ो खर्च नतीजा फुस
हर बच्चा स्कूल पहुंचे इसके लिए शासन प्रशासन की ओर से भले ही स्कूल चले हम अभियान के तहत एड़ी चोटी का जोर लगाया गया हो लेकिन अब तक अभियान के बेअसर रहा शासकीय स्कूलों में उपस्थित छात्र संघ के कुछ ऐसा ही बयां कर रही है प्रवेशोत्सव के बाद से ज्यादातर स्कूलों में छात्रों की संख्या एक तिहाई से भी कम है स्थिति शहर में स्थित स्कूलों की है ग्रामीण अंचल में स्कूलों में छात्रों की और भी खराब है

अभियान में खाना पूर्ति बनी वजह
छात्रों की कम उपस्थिति को लेकर वैसे तो स्कूल के प्रचार व शिक्षा अधिकारी सबसे तेज शुरुआत का हवाला दे रहे हैं लेकिन वर्तमान की वस्तूची स्कूल चले हम अभियान में की गई खानापूर्ति का नतीजा माना जा रहा है विभाग के कुछ अधिकारी इस बात को नाम नहीं छापने की शर्त पर स्वीकार कर रहे हैं कि जब अभियान केवल कागज तक सीमित है तो परिणाम कैसे बेहतर होगा हाल में ही पुष्पराजगढ़ क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में शिक्षक नाम मात्र के लिए विद्यालय जाते हैं देखा जाता है कि विद्यालय कि नहीं बस के समय पर स्कूल बंद हो जाता है यहां तक की शिक्षक कभी-कभार ही स्कूल पहुंचते हैं जहां शिक्षक स्कूल तो कभी कबार पहुंच तो जाते हैं लेकिन दिन भर गपशप में पूरा समय निकाल देते हैं

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