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अभिशापित होता आरक्षण



बात आरक्षण की है तो पहले ये स्पष्ट करना जरूरी है कि वैदिक काल से ही समाज 4 वर्णों में विभाजित था : ब्राह्मण, राजन्य या क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | प्रत्येक वर्ण का अपना कार्य निर्धारित था जिसे वे पूरे रीति रिवाज के साथ करते थे | हर एक को जन्म से ही वर्ण दे दिया जाता था ।जो की वैदिक काल से ही चलता आ रहा है।व्यक्ति जो कार्य करता था उसी अनुसार उसका वही वर्ण हो जाता था। ब्राम्हण शिक्षा देने तथा अनुष्ठान करने का कार्य करते थे। क्षत्रिय शासकों और राजाओं के वर्ग में आते थे और उनका कार्य लोगों की रक्षा करना और साथ ही साथ समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना होता था |वैश्य लोग वे लोग होते थे जो व्यापार, खेतीबाड़ी और पशु पालना इत्यादि का कार्य करते थे | यद्यपि सभी तीनों वर्णों को उच्च स्थान मिला था और ये सभी पवित्र धागे को धारण कर सकते थे, पर शूद्रों को ये सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और इनहे इनके कार्य के आधार पर आँका जाता था।

वैदिक काल से ऐसा ही चला आ रहा है लेकिन अब शुद्रो की यह मांग बढ़ती जा रही है की उन्हें ब्राम्हण का दर्जा दे दिया जाना चाहिए। वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था लोगो के कार्य विभाजन के आधार पर तय की गयी थी जिन लोगो को जो काम आता था वे वही काम करते थे और वही उनका व्यवसाय बन जाता था।उनके पूर्वज जो काम करते थे वही उनकी आने वाली पीढियां करती थी। लेकिन अब शुद्रो को आरक्षण मिल जाने पर उन्हें विशेष् समाज के रूप में जाना जाने लगा है। उनमे अहंकार जाग गया है। सरकार के द्वारा उन्हें इतनी ज्यादा तवज़्ज़ो मिलनेे के कारण उनमे यह गुरुर हो गया है की वे आरक्षित वर्ग से है और यदि उनसे ये कहा जाय की वे अपना आरक्षण छोड़ दे तो वे केवल अपने स्वार्थ को देखते है वे अपना आरक्षण छोड़ने को तैयार ही नही है। वे हवाला देते है हिन्दू वर्ण व्यवस्था का,की उनके साथ आदि काल से भेदभाव होता आ रहा है उन्हें मंदिरो में अब भी नही आने दिया जाता।जबकि वे अपनी समाज के लिए अलग से मंदिर तक बना रहे है।बडे बड़े पवित्र मंदिरो और तीर्थ स्थलो में शुद्रो से आधार कार्ड थोड़ी माँगा जाता है या फिर किसी भी वर्ग के व्यक्ति की पहचान नही पूछी जाती है भगवन के लिए सब एक बराबर होते है उनके दरबार में कोई निम्न या उच्च नही होता है बदलते समाज ने लोगो की मानसिकता को ख़राब करके रख दिया है। लोग दुसरो का हक़ छीनने से पीछे नही हट रहे है और सरकार भी यह नही समझ पा रही है की आरक्षण का हल कैसे निकाले। सरकार को आर्थिक आधार पर आरक्षण देना चाहिए जो की उचित है लेकिन यह भी जरुरी नही है की शुद्र ही हमेशा गरीब होते है बल्कि हर वर्ग के लोगो में निर्धनता होती है । आज सरकार ने जाति के नाम पर दलितों को इतना कुछ दे रखा है की एयर कंडिसनर वाले पक्के मकान में बैठ कर भी दलित ऐसा कहते है की वे शोषित है। बल्कि शोषित तो वे लोग है जो गरीब भी है और अनारक्षित वर्ग से भी है। जिन्हें सरकार कुछ नही देती न शिक्षा के क्षेत्र में न ही रोजगार के क्षेत्र में। आखिर जाति के नाम पर ये भेदभाव कब ख़त्म होगा।भारत के हर एक हिस्से में लोग आरक्षण का विरोध करते है इसके विपरीत आरक्षित वर्ग अपना आरक्षण छोड़ने को तैयार नही होता है। आंदोलनों से लेकर सोशल मीडिया तक आरक्षित वर्ग भेदभाव की दलील देता है और एक मुख्य मांग यह रखता है की मंदिरो में पुजारी उन्हें बनाया जाये।इस वर्ष लोक सेवा आयोग की तर्ज पर लिखित परीक्षा और साक्षत्कार के बाद केरल के त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड ने 62 पुजारियो की भर्ती की जिनमे 36 गैर ब्रम्हाण है जिनमे 6 दलित शामिल है।यह मांग कई सालों से चली आ रही थी की अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगो को पुजारी बनाया जाये। पिछली बार पिछड़ा वर्ग को शामिल किया गया था और अब sc st को भी शामिल कर लिया गया है। इससे केरल के आरक्षित वर्ग को भी राहत मिली है की जो वे वर्षो से चाहते थे वो आखिरकार उन्हें मिल गया है।कथित रूप से दलितों से भेदभाव की शुरुआत मंदिरो से होती है और उनका यह कहना होता है की मंदिरो में उन्हें जाने नही दिया जाता। यह एक जातिगत तथ्य है जिसे मंदिरो से तो जोड़ा जा सकता है लेकिन शिक्षा और नोकरी से नही। यहाँ आकर मंदिरो वाला मामला ख़त्म हो जाना चाहिए क्योंकि समय बदल गया है और मंदिरो में प्रवेश और पुजारियो का दलित होना जैसी मांगे पूरी कर दी गयी है।तो फिर शिक्षा और नोकरी के क्षेत्र में आरक्षण कब तक चलेगा?? आरक्षण के कारण योग्यता से खिलवाड़ निरंतर चल रहा है।
कथित रूप से व्यापम की शिक्षाकर्मी भर्ती परीक्षा में अंग्रेजी विषय में - 2.5 माइनस अंक पाने वाला SC उम्मीदवार अपने कोटे में पहले स्थान में आया है। ये परिणाम वाकई आश्चर्यचकित करने वाला है। इसके बाद यदि अनारक्षित वर्ग आरक्षण का विरोध करे तो वह गलत क्यों है और यदि इन विरोध करने वालो में महिलाये शामिल हों तो उनसे यह प्रश्न किया जाता है की उन्हें महिला आरक्षण मिल रहा है तो वे आरक्षण का विरोध क्यों करती है।यदि वे महिलाये आरक्षण छोड दे तो उन्हें आरक्षण का विरोध करने की आजादी है और यदि वे अपना आरक्षण नही छोड़ती तो विरोध न करे क्योकि वे महिला आरक्षण का लाभ उठा रही है।

यही सोच महिलाओ को समाज से पृथक कर देती है।अब सवाल यह उठता है की यदि महिलाओ को आरक्षण मिलता है तो upsc की परीक्षा में अधिक अंक लाने वाली सामान्य वर्ग की महिला को कम अंक लेने वाले दलित पुरुष से निम्न स्थान क्यों मिलता है??उसकी भर्ती उसकी योग्यतानुसार क्यों नही हुई और इस स्थान पर महिला आरक्षण क्यों नही मिला?? इस प्रकार आरक्षण केवल पुरुषो की ही समस्या नही बल्कि महिलाओ की भी समस्या है।


शिवांगी पुरोहित, स्वतंत्र लेखक

यह लेखक के स्वयं के विचार है

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