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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से ही हारेगी कांग्रेस

छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ की राजनीति राज्य के गठन होने के बाद से ही आदिवासी वोट बैंक के इर्द गिर्द ही घूमती आई है. हालांकि राजा महाराजाओं का दबदबा भी प्रदेश के कई इलाकों में रहा है लेकिन ये बात वो भी जानते थे कि राज करना है तो प्रजा को साथ लेकर चलना होगा. और वहां कि प्रजा अधिकतर अदिवासी ही रही है खासकर बस्तर और सरगुजा क्षेत्र की.

एक नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से जब छत्तीसगढ़ अलग हुआ तो विधायकों की संख्या बल के आधार पर कांग्रेस की सरकार बन गई. राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य भी आदिवासी नेता अजीत जोगी को मिला. लेकिन जब 3 साल बाद यानि साल 2003 में चुनाव हुए तो बीजेपी की रमन सरकार को जनता ने चुना.
बीजेपी सरकार के कार्यकाल में जनता को ऐसा लगने लगा था विकास से कोसो दूर रहने वाला राज्य कहीं न कहीं विकास की धारा से जुड़ सा रहा है. ये बात छत्तीसगढ़वासियों को समझ आ ही रही थी कि साल 2007 आ गया. यानि फिर चुनाव का बिगुल बज गया. इन 5 सालों में विकास तो हुआ लेकिन शहरों का... आदिवासी इलाके विकास से कोसों दूर थे.

कांग्रेस ने साल 2007 के चुनाव में बीजेपी को तगड़ा कॉम्पिटिशन दिया. बस्तर में तो कांग्रेस ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाई पर सरगुजा में कांग्रेस का दम बरकारार रहा. लेकिन तब भी कांग्रेस सरकार बनाने लायक आंकड़ा नहीं छू पाई और 2007 के चुनावों में 90 सीटों में से बीजेपी को 49 सीटें मिलीं तो कांग्रेस को 39 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा.
कांग्रेस खेमे में निराशा
दूसरी बार सत्ता से बाहर बैठने के बाद कांग्रेस में असंतोष और निराशा का भाव आ गया. साल 2007 से अब तक कांग्रेस में भीतरघात जमकर फैला. दिग्गज कांग्रेसियों का मनमुटाव आम जनता भी पिछले साल भर से हो रहीं सभाओं में खुलेआम देख रही है. चुनावी बिगुल जैसे ही बजा कांग्रेस ने प्रदेश की बीजेपी सरकार का भ्रष्टाचार और नाकामियों को गिनाने के लिए परिवर्तन यात्रा निकालनी शुरू की. पर परिवर्तन यात्राओं के दौरान होने वाली सभाओं में आजीत जोगी बनाम कांग्रेस दिख रहा था.
उदहारण के तौर पर बात करें तो यदि कोई सभा चल रही हो और इस बीच जोगी मंच पर पहुंच  जाएं और प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष सभा को संबोधित कर रहे हों तो जोगी समर्थक नारे लगाते हुए पहले जोगी को माईक देने की मांग करने लगते. एक सभा के दौरान तो बात इतनी बिगड़ गई की प्रदेश प्रभारी और जोगी के बीच मंच पर ही बहस हो गई.
लेकिन उसी बीच एक घटना ऐसी हुई की उसने कांग्रेस को ही नहीं देशभर को हिला कर रख दिया . बस्तर में परिवर्तन यात्राओं का दौर चल रहा था तभी नक्सलियों ने अपनी कायराना करतूत को अंजाम दिया. झीरम घाटी के पास करीब 100 से 150 नक्सलियों ने कांग्रेसियों के काफिले पर घात लगा कर हमला कर दिया. नक्सलियों के पास किन किन नेताओं को मारना है उन नेताओं की मानों पूरी  फेरिस्त थी. तभी तो उन्होंने कांग्रेसियों से नाम पूछ पूछ कर मारा. हमले में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, प्रदेश के पूर्व मंत्री और नक्सलियों के खिलाफ मुहीम छेड़ने वाले महेंद्र कर्मा समेत 31 कांग्रेसियों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया. पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ल को भी गोली लगी थी जिनकी इलाज के दौरान मौत हो गई.
जिस सभा से कांग्रेसी लौट रहे थे उस सभा में अजीत जोगी भी मौजूद थे. लेकिन जोगी थोड़ा पहले ही हेलीकॉप्टर से वहां से निकल गए. घटना के बाद राजनीति तो होना थी सो हुई. किसी ने प्रदेश की बीजेपी सरकार पर हमला करवाने का आरोप लगाया तो किसा ने तो यहां तक कह दिया कि अजीत जोगी के इशारों पर नक्सलियों ने हमला किया है.
हमले के 2-3 दिन बाद नक्सलियों ने एक विज्ञप्ति जारी कर हमले की जिम्मेदारी ली और कुछ लोगों की मौत पर अफसोस जताया साथ ही ये भी कहा कि किसी के इशारे पर उन्होंने हमला नहीं किया है. क्योंकि किसी के इशारों पर हमले का आरोप लगाने वालों को एक बात तो समझनी चाहिए कि नक्सली कभी फिरौती य किसी के कहने पर हमला नहीं करते.
खैर जो हुआ सो हुआ, समय आगे बढ़ रहा था. चुनाव नजदीक आता देख कांगेस को नया प्रदेश अध्यक्ष ढूंढना था. हमेशा की तरह एक बार फिर प्रदेश में आदिवासी प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बात उठी,जोगी ने फिर प्रदेश अध्यक्ष के लिए दावेदारी की रायपुर से दिल्ली खूब चक्कर काटे. लेकिन आलाकमान ने चरणदास महंत को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.
महंत के प्रदेश अध्यक्ष बनते ही जोगी और उनके समर्थक फिर आक्रामक हो गए. और पार्टी की ही खुले तौर पर विरोध करने लगे. इसका प्रमाण तब और मिल गया जब पार्टी ने चुनावों के लिए दावेदारों से नाम मांगे तो सबसे ज्यादा जोगी समर्थकों ने दिग्गज नेताओं के विधानसभा क्षेत्र से ही दावेदारी के आवेदन दिए.
कांग्रेस बनाम जोगी
प्रदेश अध्यक्ष का पद न मिलने के बाद जोगी चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के लिए दावेदारी कर रहे हैं. इसके लिए जोगी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से भी मिल चुके हैं. साथ ही सूत्र बताते हैं कि जोगी ने अपने कुछ समर्थित विधायकों को दिल्ली में ही रह कर आलाकमान पर दबाव बनाने को कहा है. लेकिन अंदरखाने की खबर ये है कि पार्टी जोगी को लोकसभा चुनाव लड़ाकर प्रदेश की राजनीति से दूर रखना चाहती है. लेकिन जोगी हैं कि प्रदेश की राजनीति करना चाहते हैं.
हाल ही में कई अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक जोगी को मनमाफिक पद न मिलने पर वो पार्टी छोड़ने पर भी विचार कर रहे हैं. कई राजनीतिक दलों से जोगी की बातचीत चल रही है. कई अखबारों में तो ये तक छपा है कि जोगी किसी पार्टी में न जाकर अपनी खुद की पार्टी बना सकते हैं और साल के अंत में होने वाले चुनावों में अपनी दावेदारी करेंगे.
जोगी जो चाहते हैं अलाकमान उन्हें वो देगा ऐसा होने के आसार कम ही दिख रहे हैं क्योंकि महंत को आलाकमान ने प्रदेश में मेहनत करने और सत्ता वापसी करारने को कहा है. लेकिन कांग्रेस को अगर सत्ता पर काबिज होना है तो जोगी को मनाना ही होगा. अगर जोगी कोई और राह पकड़ लेते हैं तो इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा. क्योंकि जोगी एक अदिवासी जन नेता हैं. अदिवासी बहुल इलाकों में आज भी जोगी की तूती बोलती है.
जोगी का कांग्रेस से अगल होना कांग्रेस का काफी हद तक आदिवासी वोटबैंक खोने जैसा होगा. ये बात जोगी भी जानते हैं और कांग्रेस भी. यही वजह है कि जोगी आपनी बात मनवाने के लिए अब आर पार की लड़ाई पर उतर आए हैं. ऐसे में साफ है कि अगर हालात नहीं सुधरे और जोगी को कांग्रेस नही मना पाई तो आने वाले विधानसभा चुनावों में मुकाबला कांग्रेस बनाम बीजेपी नहीं कांग्रेस बनाम कांग्रेस होगा. य यूं कहें कि कांग्रेस बनाम जोगी होगा.
वैसे अजीत जोगा ने रविवार को दिल्ली में एक डिनर पार्टी का आयोजन किया. आपको जानकर हैरानी होगी कि पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष चरणदास महंत और नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे भी पहुंचे. दो दिन पहले तक जोगी के खिलाफ बोलने वाले इन दोनों नेताओं का जोगी की पार्टी में पहुंचना कई सवाल खड़े करता है.

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