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1972 में सेना नहीं करना चाहती थी गणतंत्र दिवस परेड

नई दिल्ली। सन् उन्नीस सौ बहत्तर में सेना मुख्यालय की ओर से सिफारिश की गई थी कि गणतंत्र दिवस की परेड का आयोजन न किया जाए। वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पाकिस्तान के खिलाफ 1971 में सेना को मिली शानदार जीत के जश्न के लिए परेड के आयोजन की पक्षधर थीं।

इसी तरह के और भी कई किस्सों का खुलासा हुआ है किताब 'फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ : द मैन एंड हिज टाइम्स' में। सैम के नाम से मशहूर इस करिश्माई सैन्य अधिकारी पर यह किताब लंबे समय तक उनके साथ काम करने वाले ब्रिगेडियर बेहरम पंथाकी व उनकी पत्नी जेनोबिया ने लिखी है। 1971 के युद्ध में पाक पर जीत के बाद देश में उल्लास का माहौल था। किताब के अनुसार, 'भारतीय सेना ने खुद को दोषमुक्त कर लिया था। 1962 में चीन से हुई हार का भूत भी भाग चुका था। अब भी मोर्चे पर तैनात इकाइयों के मद्देनजर सेना मुख्यालय चाहता था कि गणतंत्र दिवस की परेड को रद कर दिया जाए, लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी समारोह का आयोजन करना चाहती थीं। एक जीत थी, जिसका उत्सव मानाया जाना था व शहीदों को श्रद्धांजलि दी जानी थी।'

तात्कालिक सूचना के आधार पर सीपीडब्ल्यूडी ने इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति स्थापित की। पंथाकी ने लिखा, '26 जनवरी, 1972 को इंदिरा गांधी ने परेड से ठीक पहले राजपथ पर खुली जीप में यात्रा की। इसके बाद एक हल्के स्तर की परेड का आयोजन हुआ। टुकड़ियों पर युद्ध की थकान दिख रही थी।' किताब में इस बात का जिक्र भी किया गया है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गणतंत्र दिवस के दिन ही मानेकशॉ को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद पर नियुक्त करना चाहती थीं, लेकिन रक्षा मंत्री जगजीवन राम व एयर चीफ मार्शल पीसी लाल के नेतृत्व में कई कांग्रेस नेताओं ने इस कदम का विरोध किया था। किताब का प्रकाशन नियोगी द्वारा किया गया है। किताब में इस बात का भी जिक्र है कि 1947 में जब पाक सेनाएं कश्मीर की ओर कदम बढ़ा रही थीं, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू वहां सेना भेजने से पहले संयुक्त राष्ट्र से मशविरा करने के इच्छुक थे। उस वक्त सरदार पटेल ने उन्हें सेना भेजने के लिए तैयार किया था।

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