2030 में प्यासा रहेगा आधा हिंदुस्तान
नई दिल्ली । अगर बारिश का पानी नहीं सहेजा गया तो 2030 में आधा हिंदुस्तान प्यासा रह जाएगा। देश के कई भागों में तेजी से हो रहे भूजल दोहन के चलते देश के कई क्षेत्रों में जल संकट गहरा रहा है। बारिश के पानी का उचित संरक्षण न होने की वजह से यह दिक्कत दिनों-दिन विकराल होती जा रही हैं और भूजल पर दवाब बढ़ता जा रहा है।
योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में फिलहाल 1123 अरब घनमीटर जल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है, जबकि मांग 710 अरब घनमीटर है। फिलहाल यह स्थिति संतुलित लगती है, लेकिन 2025 में जल की मांग बढ़कर 1093 अरब घनमीटर हो जाएगी। पानी की मांग अगर इसी तेजी से बढ़ती रही तो 2030 में आधी मांग पूरी नहीं हो पाएगी। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के मुताबिक राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में 2002-2012 के दौरान जलस्तर में चार मीटर से अधिक की गिरावट हुई है। जलस्तर हर साल औसतन 10-20 सेमी गिर रहा है। कहीं-कहीं तो यह गिरावट ज्यादा भी है। देश के 802 ब्लॉक में भूजल के अतिदोहन से उन क्षेत्रों में जल संकट मंडरा रहा है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पंजाब के 80 प्रतिशत, हरियाणा के 59 प्रतिशत, राजस्थान के 69 प्रतिशत, दिल्ली के 74 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 9 प्रतिशत ब्लॉक में भूजल का अति-दोहन हुआ है। केंद्र सरकार ने भूजल का अत्याधिक दोहन रोकने के लिए कोशिश भी की है।
दरअसल जल राज्य का विषय है। इसलिए भूजल के संबंध में नियम बनाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। केंद्र ने भूजल का दोहन रोकने के लिए राज्यों को एक मॉडल विधेयक भेजा है। केंद्र ने शुरू में यह मॉडल विधेयक 1970 में भेजा था। इसके बाद इसे 1992, 1996 और 2005 में राज्यों को भेजा गया। अब तक सिर्फ 11 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ही यह कानून बनाया है। बाकी 18 राज्य व केंद्रशासित प्रदेश इसे कानून का रूप देने की प्रक्रिया में हैं। केंद्र ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण का गठन भी किया है, जिसने 800 से अधिक क्षेत्रों में भूजल के दोहन पर अंकुश लगाया है।
प्राधिकरण ने दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव में हाउसिंग सोसाइटी, होटल और उद्योगों को भूजल का दोहन करने के बजाय वर्षा जल संग्रहण को कहा है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान डगवेल के जरिये भूजल रिचार्ज की एक योजना भी शुरू की थी।
दूषित भूजल भी बना चुनौती
गांवों में 85 प्रतिशत लोग पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए भूजल का इस्तेमाल करते हैं। अगर भूजल में 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर से अधिक की मात्र में फ्लोराइड होता है तो वह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है। उत्तर प्रदेश के दस जिलों आगरा, अलीगढ़, एटा, फिरोजाबाद, जौनपुर, कन्नौज, महामायानगर, मैनपुरी, मथुरा और मऊ में भूजल में फ्लोराइड की मात्र मान्य सीमा से अधिक है जो यहां के लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक है।
इसी तरह बिहार के औरंगाबाद, बक्सर, बांका, जमुई, कैमूर, मुंगेर, नवादा, रोहतास और सुपौल में भी फ्लोराइड का स्तर काफी अधिक है। दूसरी बड़ी समस्या जल में आर्सेनिक की मात्रा है। जल में 0.05 मिलीग्राम प्रतिलीटर से अधिक आर्सेनिक सेहत के लिए खतरनाक होता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा काफी अधिक है।
योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में फिलहाल 1123 अरब घनमीटर जल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है, जबकि मांग 710 अरब घनमीटर है। फिलहाल यह स्थिति संतुलित लगती है, लेकिन 2025 में जल की मांग बढ़कर 1093 अरब घनमीटर हो जाएगी। पानी की मांग अगर इसी तेजी से बढ़ती रही तो 2030 में आधी मांग पूरी नहीं हो पाएगी। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के मुताबिक राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में 2002-2012 के दौरान जलस्तर में चार मीटर से अधिक की गिरावट हुई है। जलस्तर हर साल औसतन 10-20 सेमी गिर रहा है। कहीं-कहीं तो यह गिरावट ज्यादा भी है। देश के 802 ब्लॉक में भूजल के अतिदोहन से उन क्षेत्रों में जल संकट मंडरा रहा है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पंजाब के 80 प्रतिशत, हरियाणा के 59 प्रतिशत, राजस्थान के 69 प्रतिशत, दिल्ली के 74 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 9 प्रतिशत ब्लॉक में भूजल का अति-दोहन हुआ है। केंद्र सरकार ने भूजल का अत्याधिक दोहन रोकने के लिए कोशिश भी की है।
दरअसल जल राज्य का विषय है। इसलिए भूजल के संबंध में नियम बनाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। केंद्र ने भूजल का दोहन रोकने के लिए राज्यों को एक मॉडल विधेयक भेजा है। केंद्र ने शुरू में यह मॉडल विधेयक 1970 में भेजा था। इसके बाद इसे 1992, 1996 और 2005 में राज्यों को भेजा गया। अब तक सिर्फ 11 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ही यह कानून बनाया है। बाकी 18 राज्य व केंद्रशासित प्रदेश इसे कानून का रूप देने की प्रक्रिया में हैं। केंद्र ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण का गठन भी किया है, जिसने 800 से अधिक क्षेत्रों में भूजल के दोहन पर अंकुश लगाया है।
प्राधिकरण ने दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव में हाउसिंग सोसाइटी, होटल और उद्योगों को भूजल का दोहन करने के बजाय वर्षा जल संग्रहण को कहा है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान डगवेल के जरिये भूजल रिचार्ज की एक योजना भी शुरू की थी।
दूषित भूजल भी बना चुनौती
गांवों में 85 प्रतिशत लोग पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए भूजल का इस्तेमाल करते हैं। अगर भूजल में 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर से अधिक की मात्र में फ्लोराइड होता है तो वह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है। उत्तर प्रदेश के दस जिलों आगरा, अलीगढ़, एटा, फिरोजाबाद, जौनपुर, कन्नौज, महामायानगर, मैनपुरी, मथुरा और मऊ में भूजल में फ्लोराइड की मात्र मान्य सीमा से अधिक है जो यहां के लोगों की सेहत के लिए नुकसानदायक है।
इसी तरह बिहार के औरंगाबाद, बक्सर, बांका, जमुई, कैमूर, मुंगेर, नवादा, रोहतास और सुपौल में भी फ्लोराइड का स्तर काफी अधिक है। दूसरी बड़ी समस्या जल में आर्सेनिक की मात्रा है। जल में 0.05 मिलीग्राम प्रतिलीटर से अधिक आर्सेनिक सेहत के लिए खतरनाक होता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा काफी अधिक है।

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