आज ही लगी थी इमरजेंसी!
नई दिल्ली।
26 जून 1975। यही वो तारीख है जब भारतीय लोकतंत्र को 28 साल की भरी जवानी
में इमरजेंसी के चाकू से हलाल कर दिया गया। ये चाकू किसी सैन्य जनरल के
नहीं, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में था। 1971 में बांग्लादेश
बनवाकर शोहरत के शिखर पर पहुंचीं इंदिरा को अब अपने खिलाफ उठी हर आवाज एक
साजिश लग रही थी। लाखों लोग जेल में डाल दिए गए। लिखने-बोलने पर पाबंदी लग
गई। दरअसल, इस सबकी शुरुआत जनवरी 1974 में गुजरात से हुई थी। लोग जमाखोरी
और महंगाई से त्रस्त थे और इसी बीच वहां के कॉलेजों में मेस का बिल बढ़ा
दिया गया। एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने इसके विरोध की शुरुआत की
जो धीरे-धीरे बड़े छात्र आंदोलन में तब्दील हो गया।
गुजरात सरकार ने छात्रों पर लाठी-गोली बरसाकर आंदोलन का दमन करना चाहा। इस दमन के खिलाफ पूरा गुजरात उठ खड़ा हुआ। 26 जनवरी को गुजरात के 48 शहरों में कर्फ्यू लगा था। ये आग तब और भड़की जब 1942 के हीरो कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण गुजरात पहुंचे। आखिरकार गुजरात के चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे ने देशव्यापी स्वरूप धारण कर लिया। विपक्ष ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मुहिम तेज कर दी।
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया। उन पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ा, लेकिन उन्होंने 25 जून को इमरजेंसी की घोषणा कर दी। विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जाहिर है, इंदिरा गांधी अहंकार में डूबी हुई थीं। इमरजेंसी में तीन महीने जेल में बिताने वाले इंडियन एक्सप्रेस के संपादक कुलदीप नैयर को वो मंजर अच्छी तरह याद हैं जब जुबान पर ताले जड़ दिए गए थे।
इंदिरा गांधी ने शुरुआत में कहा था कि इमरजेंसी के खिलाफ एक कुत्ता भी नहीं भौंका, लेकिन धीरे-धीरे साबित होने लगा कि उन्होंने जनता को समझने में भूल की। जल्द ही इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय की छवि खलनायक सरीखी हो गई। जयप्रकाश का संपूर्ण क्रांति का नारा लोगों के दिलों में घर कर गया। अहमदाबाद से लेकर पटना तक आंदोलन की आग में सुलग उठे। पटना की रैली में जयप्रकाश नारायण पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया जिससे तूफान खड़ा हो गया।
बहरहाल, इंदिरा खुद को देश का उद्घारक समझ रही थीं। लेकिन आम लोगों के लिए इमरजेंसी का मतलब था संजय के नेतृत्व में खड़ी हुई यूथ कांग्रेस का उत्पात, अंधाधुंध नसबंदी अभियान और फर्जी मुठभेड़ों से भरा पुलिसिया राज। जाहिर है, आंदोलन का वेग बढ़ता चला गया।
गली-गली इंदिरा और संजय के खिलाफ नारे लग रहे थे। इंदिरा पर दबाव बढ़ता जा रहा था। आखिरकार उन्हें समझ में आ गया कि इस रास्ते पर वो बहुत दूर तक नहीं जा सकतीं। 1977 की शुरुआत में अचानक उन्होंने इमरजेंसी हटाने का फैसला किया। मार्च 1977 के चुनाव में जनता ने अपनी ताकत दिखा दी। कांग्रेस को पहली बार केंद्र की सत्ता से बेदखल होना पड़ा। खुद इंदिरा गांधी भी रायबरेली से चुनाव हार गईं, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। तानाशाही इरादों को हमेशा के लिए सबक मिल चुका था।
गुजरात सरकार ने छात्रों पर लाठी-गोली बरसाकर आंदोलन का दमन करना चाहा। इस दमन के खिलाफ पूरा गुजरात उठ खड़ा हुआ। 26 जनवरी को गुजरात के 48 शहरों में कर्फ्यू लगा था। ये आग तब और भड़की जब 1942 के हीरो कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण गुजरात पहुंचे। आखिरकार गुजरात के चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे ने देशव्यापी स्वरूप धारण कर लिया। विपक्ष ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मुहिम तेज कर दी।
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया। उन पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ा, लेकिन उन्होंने 25 जून को इमरजेंसी की घोषणा कर दी। विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जाहिर है, इंदिरा गांधी अहंकार में डूबी हुई थीं। इमरजेंसी में तीन महीने जेल में बिताने वाले इंडियन एक्सप्रेस के संपादक कुलदीप नैयर को वो मंजर अच्छी तरह याद हैं जब जुबान पर ताले जड़ दिए गए थे।
इंदिरा गांधी ने शुरुआत में कहा था कि इमरजेंसी के खिलाफ एक कुत्ता भी नहीं भौंका, लेकिन धीरे-धीरे साबित होने लगा कि उन्होंने जनता को समझने में भूल की। जल्द ही इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय की छवि खलनायक सरीखी हो गई। जयप्रकाश का संपूर्ण क्रांति का नारा लोगों के दिलों में घर कर गया। अहमदाबाद से लेकर पटना तक आंदोलन की आग में सुलग उठे। पटना की रैली में जयप्रकाश नारायण पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया जिससे तूफान खड़ा हो गया।
बहरहाल, इंदिरा खुद को देश का उद्घारक समझ रही थीं। लेकिन आम लोगों के लिए इमरजेंसी का मतलब था संजय के नेतृत्व में खड़ी हुई यूथ कांग्रेस का उत्पात, अंधाधुंध नसबंदी अभियान और फर्जी मुठभेड़ों से भरा पुलिसिया राज। जाहिर है, आंदोलन का वेग बढ़ता चला गया।
गली-गली इंदिरा और संजय के खिलाफ नारे लग रहे थे। इंदिरा पर दबाव बढ़ता जा रहा था। आखिरकार उन्हें समझ में आ गया कि इस रास्ते पर वो बहुत दूर तक नहीं जा सकतीं। 1977 की शुरुआत में अचानक उन्होंने इमरजेंसी हटाने का फैसला किया। मार्च 1977 के चुनाव में जनता ने अपनी ताकत दिखा दी। कांग्रेस को पहली बार केंद्र की सत्ता से बेदखल होना पड़ा। खुद इंदिरा गांधी भी रायबरेली से चुनाव हार गईं, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। तानाशाही इरादों को हमेशा के लिए सबक मिल चुका था।

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