कंडोम के ‘नैतिक’ जाल में फंसे स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन
नई दिल्ली : कंडोम के इस्तेमाल को प्राथमिकता नहीं देने संबंधी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के बयान से चिकित्सक व विशेषज्ञ सहज नहीं हैं। डा. हर्षवर्धन का मानना है कि सिर्फ नैतिकता के पाठ से एड्स व संबंधित बीमारियों से लड़ा नहीं जा सकता।
साहित्यकार व बुद्धिजीवियों का कहना है कि भारत औपनिवेशिक काल से नहीं गुजर रहा है। आधुनिक भारत में संस्कृति के साथ ही चिकित्सा सलाह भी अनिवार्य है। चिकित्सा सलाह व उपकरण के बगैर एड्स रोग से निपटना अधूरा व खतरनाक होगा।
उल्लेखनीय है कि एक दिन पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने ‘न्यूयार्क टाइम्स’ को इंटरल्यू दिया था। डा. हर्षवर्धन ने कहा था कि एड्स जागरूकता आंदोलन में कंडोम के उपयोग को जरूरत से ज्यादा प्राथमिकता दी गई है।
सरकारी चैलन दूरदर्शन में काफी विज्ञापन दिए गए, जो ठीक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि रोग से निपटने के लिए हमें नैतिकता को बढ़ावा देना चाहिए था। यह भारत की संस्कृति का हिस्सा है। हमारी सरकार नैतिकता को बढ़ावा देगी। इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं।
लेखिकाइरा त्रिवेदी केंद्रीय मंत्री के विचारों से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि समय बदल रहा है। एक शोध में शादी से पहले (18 से 24 साल) सैक्स संबंधों के 75 फीसद से अधिक मामलों का पता लगा है।
उनका कहना है कि सैक्स संस्कृति को हमें आधुनिक संदर्भों में देखना चाहिए तभी हम स्थिति को समझ पाएंगे और उससे निपटने की आधुनिक तरीकों को ही प्राथमिकता देंगे।
राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डा. के.के. अग्रवाल का कहना है कि नैतिकता के प्रति लोगों को जागरूक करना जरूरी है लेकिन केवल नैतिकता से काम नहीं चलेगा। हमें ध्यान रखना होगा कि एड्स जागरूकता का नारा ‘ए.बी.सी.’ है।
यानी संयम (ए), विश्वास (बी) और कंडोम (सी)। अकेले शिक्षा से काम नहीं चलेगा। अगर हम नैतिकता का ही पहाड़ा पढ़ाने पर जोर देते रहे, तो खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी को सैक्स के प्रति अधिक झुकाव होता है, तो उसे चिकित्सा सलाह की जरूरत है।
उसके बगैर हम कोई रोकथाम नहीं कर सकते हैं। बेशक कंडोम अंतिम रास्ता है लेकिन उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। नैशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी (नाको) के प्रमुख वी.के. सुबुराज का कहना है कि नैतिकता की बात सही है लेकिन नैतिकता की चादर बहुत कमजोर हो गई है।
उन्होंने बताया कि डा. हर्षवर्धन का कहना है कि विवाह पूर्व और विवाह के बाद किसी अन्य से शारीरिक संबंध गलत है। हम इस दिशा में जागरूकता फैलानी है।
एड्स के क्षेत्र में काम कर रही एन.जी.ओ. ‘नाज’ की प्रमुख अंजली गोपालन का कहना है कि संयम विश्वास और कंडोम (ए.बी.सी.) में से किसी एक पर ही जोर देना खतरनाक हो सकता है।
नैतिकता का पाठ अगर सुदृढ़ता से लागू होगा तभी हम संस्कृति की दुहाई दे सकते हैं। मगर ऐसी स्थिति नहीं है।
साहित्यकार व बुद्धिजीवियों का कहना है कि भारत औपनिवेशिक काल से नहीं गुजर रहा है। आधुनिक भारत में संस्कृति के साथ ही चिकित्सा सलाह भी अनिवार्य है। चिकित्सा सलाह व उपकरण के बगैर एड्स रोग से निपटना अधूरा व खतरनाक होगा।
उल्लेखनीय है कि एक दिन पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने ‘न्यूयार्क टाइम्स’ को इंटरल्यू दिया था। डा. हर्षवर्धन ने कहा था कि एड्स जागरूकता आंदोलन में कंडोम के उपयोग को जरूरत से ज्यादा प्राथमिकता दी गई है।
सरकारी चैलन दूरदर्शन में काफी विज्ञापन दिए गए, जो ठीक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि रोग से निपटने के लिए हमें नैतिकता को बढ़ावा देना चाहिए था। यह भारत की संस्कृति का हिस्सा है। हमारी सरकार नैतिकता को बढ़ावा देगी। इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं।
लेखिकाइरा त्रिवेदी केंद्रीय मंत्री के विचारों से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि समय बदल रहा है। एक शोध में शादी से पहले (18 से 24 साल) सैक्स संबंधों के 75 फीसद से अधिक मामलों का पता लगा है।
उनका कहना है कि सैक्स संस्कृति को हमें आधुनिक संदर्भों में देखना चाहिए तभी हम स्थिति को समझ पाएंगे और उससे निपटने की आधुनिक तरीकों को ही प्राथमिकता देंगे।
राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डा. के.के. अग्रवाल का कहना है कि नैतिकता के प्रति लोगों को जागरूक करना जरूरी है लेकिन केवल नैतिकता से काम नहीं चलेगा। हमें ध्यान रखना होगा कि एड्स जागरूकता का नारा ‘ए.बी.सी.’ है।
यानी संयम (ए), विश्वास (बी) और कंडोम (सी)। अकेले शिक्षा से काम नहीं चलेगा। अगर हम नैतिकता का ही पहाड़ा पढ़ाने पर जोर देते रहे, तो खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी को सैक्स के प्रति अधिक झुकाव होता है, तो उसे चिकित्सा सलाह की जरूरत है।
उसके बगैर हम कोई रोकथाम नहीं कर सकते हैं। बेशक कंडोम अंतिम रास्ता है लेकिन उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। नैशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी (नाको) के प्रमुख वी.के. सुबुराज का कहना है कि नैतिकता की बात सही है लेकिन नैतिकता की चादर बहुत कमजोर हो गई है।
उन्होंने बताया कि डा. हर्षवर्धन का कहना है कि विवाह पूर्व और विवाह के बाद किसी अन्य से शारीरिक संबंध गलत है। हम इस दिशा में जागरूकता फैलानी है।
एड्स के क्षेत्र में काम कर रही एन.जी.ओ. ‘नाज’ की प्रमुख अंजली गोपालन का कहना है कि संयम विश्वास और कंडोम (ए.बी.सी.) में से किसी एक पर ही जोर देना खतरनाक हो सकता है।
नैतिकता का पाठ अगर सुदृढ़ता से लागू होगा तभी हम संस्कृति की दुहाई दे सकते हैं। मगर ऐसी स्थिति नहीं है।

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