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हंगामा करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए : सुमित्रा

नई दिल्ली : सुमित्रा महाजन मृदुभाषी और सौम्य व्यवहार के लिए जानी जाती हैं और उन्हें ‘ताई’ कहकर संबोधित करते हैं लेकिन नयी लोकसभा अध्यक्ष सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए हंगामा करने वाले सदस्यों पर ‘कड़ी’ कार्रवाई के खिलाफ नहीं हैं।सुमित्रा महाजन को पिछले सप्ताह सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष चुना गया था और वह मीरा कुमार के बाद इस पद को ग्रहण करने वाली दूसरी महिला हैं। महाजन (71 वर्ष) ने कहा कि वह सदस्यों के साथ स्वाभाविक संवाद स्थापित करने की पक्षधर हैं लेकिन सदन के हित में कठोर निर्णय करने में नहीं हिचकेंगी।

आठवीं बार सांसद बनी सुमित्रा ने साक्षात्कार में कहा, ‘जब भी कड़े निर्णय करने की जरूरत होगी, ऐसा होगा।’ सुमित्रा से पूछा गया था कि वह सदन में कामकाज किस तरह से चलाएंगी क्योंकि ऐसा बार-बार देखा गया है कि सांसदों का एक छोटा समूह आसन के समीप विरोध करते हुए कामकाज बाधित कर देता है।

उनका ध्यान इस ओर भी दिलाया गया कि पिछली लोकसभा पर सबसे कम काम होने का ठप्पा लगा क्योंकि इस दौरान सबसे अधिक व्यवधान हुए और काली मिर्च छिड़कने से लेकर कुछ अभद्र व्यवहार देखने को मिले। सुमित्रा ने सदस्यों के साथ सहज, सुलभ संवाद पर जोर दिया और संसद में काम ठीक ढंग से चलाने के लिए सत्तापक्ष तथा छोटे दलों समेत विपक्ष के साथ समन्वय बनाने की बात कही।

सुमित्रा ने कहा कि सांसदों और संसद की जिम्मेदारी उस समय और बढ़ गई है जब देश में लोकतंत्र लगातार मजबूत हो रहा है और मतदान की रूपरेखा से भी यह प्रदर्शित होता है। उन्होंने कहा, ‘लोगों की बढ़ती उम्मीदों को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है।’ यह पूछे जाने पर कि क्या खराब बर्ताव करने वाले सांसदों पर रोक लगाने के लिए वह नियम बनायेंगी, सुमित्रा ने कहा कि अगर जरूरी हुआ तब नियम बनाये जा सकते हैं लेकिन वह नेताओं से विचार विमर्श और सदस्यों को उनकी जिम्मेदारी के बारे में समझाने के बाद ही ऐसा करेगी।

पिछली लोकसभा में सबसे अधिक व्यवधान आने के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘मैं अतीत के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती हूं। मैं नये लोक सभा की अध्यक्ष नियुक्त हुई हूं।’ सुमित्रा संसद की स्थायी समिति की बैठक की कार्यवाही मीडिया के लिए खोले जाने के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि इससे मुद्दों पर आमसहमति बनाने की प्रक्रिया प्रभावित होगी।

उन्होंने कहा, ‘यह जरूरी नहीं है क्योंकि संसदीय समितियों में स्वतंत्र, स्पष्ट और विस्तृत चर्चा होती है और यह दलगत नहीं है।’ कई संसदीय समिति में हिस्सा लेने वाली वरिष्ठ सांसद महसूस करती हैं कि मीडिया को इन बैठकों की कार्यवाही में जाने की अनुमति देने से आमसहमति बनाने की भावना प्रभावित होगी जो लोकतंत्र के लिए जरूरी है। सुमित्रा ने कहा कि उन्होंने अक्सर देखा है कि सदस्य मुद्दों पर अपनी पार्टी के रूख के खिलाफ बात करते हैं। समिति में काफी सघन चर्चा होती है क्योंकि अंदर मीडिया नहीं होता है।

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