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नृपेंद्र मिश्र की नियुक्ति का रास्ता साफ

नई दिल्ली : ट्राई के पूर्व अधिकारी नृपेंद्र मिश्रा का पीएम नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव के रूप में नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। राज्यसभा ने मंगलवार को ट्राई संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी। लोकसभा में यह विधेयक पहले ही पारित हो चुका है।

राज्यसभा ने आज ‘भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण संशोधन विधेयक’ को ध्वनि मत से पारित कर दिया और इससे संबंधित कांग्रेस के टी सुब्बीरामी रेड्डी के संकल्प को खारिज कर दिया। लोकसभा इस विधेयक को कल ही पारित कर चुकी है।

यह विधेयक इस संबंध में सरकार द्वारा पूर्व में जारी अध्यादेश के स्थान पर लाया गया है।

अध्यादेश के स्थान पर लाए गए ‘भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण संशोधन विधेयक’ का विरोध कर रहे दलों ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि वे संबंधित अधिकारी की निष्ठा और ईमानदारी पर किसी प्रकार की शंका जाहिर नहीं कर रहे हैं।

कानून और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विधेयक पर हुई चर्चा का उत्तर देते हुए विपक्षी सदस्यों के इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया कि सरकार संसद की गरिमा और सर्वोच्चता को नजरअंदाज कर रही है।

उन्होंने कहा, ‘सरकार संसद की गरिमा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और विपक्ष का इस संबंध में लगाया गया आरोप पीड़ादायक है। हमारी पार्टी के जीवन मूल्य संसद की गरिमा के लिए पूरी तरह स्थायी रहेंगे।’ प्रसाद ने किहा कि 1997 में इस संबंध में बनाए गए कानून में कुछ विसंगतियां रह गयी थीं जिन्हें दूर करने के मकसद से यह विधेयक लाया गया है। उन्होंने कहा कि सभी मानकों का पालन करने हुए यह विधेयक लाया गया है इसलिए यह असंवैधानिक नहीं है।

विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए प्रसाद ने कहा कि बीते दस साल में कुल 61 अध्यादेश लाए गए और कुछ को फिर से जारी भी किया गया। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के तौर पर 1967 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी मिश्रा की नियुक्ति में आने वाले अवरोध को दूर करने के लिए सरकार ने पहले अध्यादेश जारी किया था। अध्यादेश से पहले तक ट्राई कानून के अनुसार इसके अध्यक्ष और सदस्यों के सेवानिवृत्त होने के बाद केंद्र या राज्य सरकारों में किसी पद पर नियुक्ति प्रतिबंधित थी।

कानून के इस प्रावधान के चलते 69 वर्षीय मिश्रा के मोदी के प्रधान सचिव पद पर नियुक्ति में अड़चन आ रही थी जिसके लिए नई सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर इस प्रावधान में संशोधन कर दिया। उत्तर प्रदेश कैडर के 1967 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी मिश्र ने अध्यादेश जारी किए जाने के दिन ही प्रधानमंत्री कार्यालय में पदभार संभाल लिया था।

प्रसाद ने कहा कि पेंशन विकास विनियामक प्राधिकरण और बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण समेत कई अन्य ऐसी संस्थाओं में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है और ट्राई को उनके समान लाने के लिए यह संशोधन जरूरी हो गया था। दूरसंचार मंत्री ने कहा कि अध्यादेश राजनीति का विषय नहीं होता। देश सरकार से बेहतर प्रशासन और कार्यान्वयन की अपेक्षा रखता है। ‘हमें जनमत इसीलिए मिला है। अगर प्रधानमंत्री बेहतर प्रशासन के लिए योग्य व्यक्ति की नियुक्ति करना चाहते हैं तो उसमें किसी को भला क्या आपत्ति होनी चाहिए।’

मिश्र का नाम लिए बिना प्रसाद ने कहा कि वह देश के बेहतरीन अधिकारियों में से एक हैं और उनकी क्षमता, प्रतिभा तथा अनुभव को हम सभी जानते हैं। किसी ने भी उनकी क्षमता पर सवाल नहीं उठाया है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं लाया गया है।

दूरसंचार मंत्री ने कहा कि वह (मिश्र) 1967 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और वाणिज्य, उर्वरक विभाग में सचिव पद से लेकर विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक तक में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके पास काम का लंबा अनुभव है। उन्होंने कहा ‘यह ताज्जुब की बात है कि उनका विरोध कर रही कांग्रेस को क्या इतने लंबे समय में उनके काम के बारे में जानने का मौका नहीं मिला ? मुझे इस बात की खुशी है कि पूरी चर्चा में उनकी क्षमता और योग्यता पर किसी ने भी सवाल नहीं उठाया।’

इससे पूर्व विधेयक पर चर्चा के समय कांग्रेस के टी सुब्बारामी रेड्डी ने 28 मई 2014 को राष्ट्रपति द्वारा जारी दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (संशोधन) अध्यादेश को समाप्त करने के लिए एक संकल्प पेश किया। संकल्प पेश करते हुए रेड्डी ने कहा कि वह किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं बल्कि उनका विरोध अध्यादेश जारी किए जाने के सिद्धांतों को लेकर है। उन्होंने कहा कि अध्यादेश विशेष स्थिति में जारी किया जाता है और यह एक तरह से ब्रहमास्त्र, पशुपतास्त्र या सुदर्शन चक्र है जिसका उपयोग सामान्य स्थिति में नहीं किया जाता।

विधेयक पर हुयी चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने इसका विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधन के लिए अध्यादेश जारी किए जाने का तरीका सही नहीं है और यह विधेयक संविधान का उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अध्यादेश एक व्यक्ति की नियुक्ति के लिए लाया गया। उन्होंने कहा कि यह संविधान के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।

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