भागवत के 'हिंदू' बयान पर बवाल
नई दिल्ली । लोकसभा चुनाव में जीत के लिए नेता नहीं बल्कि जनता को श्रेय दे रहे संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर भले ही चुप्पी हो, हिंदुस्तान के सभी निवासियों को हिंदू बताए जाने पर बवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस समेत विभिन्न दलों ने इस पर आपत्ति जताते हुए सलाह दी कि भागवत संविधान की भावना से छेड़छाड़ न करें।
भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने भारत की संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा था कि 'अगर अमेरिका में रहने वाले सभी लोग अमेरिकन और जर्मनी में रहने वाले जर्मन होते हैं तो हिंदुस्तान के सभी निवासी हिंदू के रूप में क्यों नहीं जाने जा सकते हैं?' भाजपा के विनय कटियार हालांकि इसे आपत्तिजनक नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा कि वह किसी भी धर्म में हस्तक्षेप की बात नहीं कर रहे थे। सिर्फ देश की सांस्कृतिक पहचान की बात कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के मनीष तिवारी, माकपा के सीताराम येचुरी व जदयू के शरद यादव ने एतराज जताते हुए कहा कि संविधान में कहीं भी हिंदुस्तान का जिक्र नहीं है।
संविधान भारत की बात करता है। बसपा की मायावती ने भी आपत्ति जताई और कहा कि भीमराव अंबेडकर ने सभी धर्मो को एक भाव से देखते हुए भारत नाम दिया था। लिहाजा भागवत को ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिनसे एकता पर असर पड़े। गौरतलब है कि यह विवाद तब खड़ा हुआ है जब लोकसभा में सांप्रदायिक हिंसा पर चर्चा प्रस्तावित है। कांग्रेस की आक्रामकता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि खुद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस संभावित चर्चा के लिए तैयारी में जुटे हैं।
बहरहाल, भागवत के उस बयान पर न सिर्फ भाजपा बल्कि दूसरे दलों में भी चुप्पी है जिसमें उन्होंने लोकसभा में जीत के लिए पूरा श्रेय जनता को दिया था। उन्होंने कहा था कि जीत किसी नेता के कारण नहीं जनता की सोच के कारण मिली है। यूं तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसका श्रेय जनता को देते रहे हैं, लेकिन पार्टी का हर कार्यकर्ता जीत के लिए नेतृत्व को श्रेय देता है। बहरहाल, भाजपा इस पर प्रतिक्रिया देने से बचती रही। कांग्रेस और सपा जैसे दलों ने भी इसे भाजपा और संघ के बीच का मामला बताकर खुद को दूर कर लिया। दरअसल, कांग्रेस खुद यह स्वीकार करना नहीं चाहती है कि जनता ने उसे अस्वीकार कर दिया है। यही हाल सपा का भी है जिसे उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में सिर्फ चार सीटें मिली है।
भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने भारत की संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा था कि 'अगर अमेरिका में रहने वाले सभी लोग अमेरिकन और जर्मनी में रहने वाले जर्मन होते हैं तो हिंदुस्तान के सभी निवासी हिंदू के रूप में क्यों नहीं जाने जा सकते हैं?' भाजपा के विनय कटियार हालांकि इसे आपत्तिजनक नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा कि वह किसी भी धर्म में हस्तक्षेप की बात नहीं कर रहे थे। सिर्फ देश की सांस्कृतिक पहचान की बात कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के मनीष तिवारी, माकपा के सीताराम येचुरी व जदयू के शरद यादव ने एतराज जताते हुए कहा कि संविधान में कहीं भी हिंदुस्तान का जिक्र नहीं है।
संविधान भारत की बात करता है। बसपा की मायावती ने भी आपत्ति जताई और कहा कि भीमराव अंबेडकर ने सभी धर्मो को एक भाव से देखते हुए भारत नाम दिया था। लिहाजा भागवत को ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिनसे एकता पर असर पड़े। गौरतलब है कि यह विवाद तब खड़ा हुआ है जब लोकसभा में सांप्रदायिक हिंसा पर चर्चा प्रस्तावित है। कांग्रेस की आक्रामकता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि खुद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस संभावित चर्चा के लिए तैयारी में जुटे हैं।
बहरहाल, भागवत के उस बयान पर न सिर्फ भाजपा बल्कि दूसरे दलों में भी चुप्पी है जिसमें उन्होंने लोकसभा में जीत के लिए पूरा श्रेय जनता को दिया था। उन्होंने कहा था कि जीत किसी नेता के कारण नहीं जनता की सोच के कारण मिली है। यूं तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसका श्रेय जनता को देते रहे हैं, लेकिन पार्टी का हर कार्यकर्ता जीत के लिए नेतृत्व को श्रेय देता है। बहरहाल, भाजपा इस पर प्रतिक्रिया देने से बचती रही। कांग्रेस और सपा जैसे दलों ने भी इसे भाजपा और संघ के बीच का मामला बताकर खुद को दूर कर लिया। दरअसल, कांग्रेस खुद यह स्वीकार करना नहीं चाहती है कि जनता ने उसे अस्वीकार कर दिया है। यही हाल सपा का भी है जिसे उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में सिर्फ चार सीटें मिली है।

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