क्यों मजबूर हैं जयललिता चिट्ठियां लिखने को?
चेन्नई : तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने तीन महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जितनी चिट्ठियां लिखी हैं उतनी उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सात महीनों में नहीं लिखी थी, बावजूद इसके कि वे संयुक्त प्रगतिशिल गठबंधन सरकार की विरोधी थीं.
इस साल जून और अगस्त के बीच उन्होंने मोदी को 27 पत्र लिखे हैं जबकि डॉक्टर मनमोहन सिंह को अक्तूबर, 2013 और अप्रैल, 2014 के बीच 21 पत्र लिखे थे.
तमिलनाडु के मछुआरों को श्रीलंका अक्सर गिरफ़्तार कर लेता है और उनकी नावों को ज़ब्त कर लेता है.
जयललिता ने ऊर्जा क्षेत्र, कावेरी जल विवाद, मुल्लापेरियार बांध, उर्वरक, वस्तु एवं सेवा कर का विरोध, रघुराम राजन पैनल की रिपोर्ट की मांग ख़ारिज करने जैसे मु्द्दे भी उठाए हैं.
विरोध
रघुराम राजन पैनल की रिपोर्ट 14वीं वित्त आयोग की रिपोर्ट का उल्लंघन करती है जो राज्यों के लिए संसाधन का प्रावधान करती है और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को रियायतें देती है जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ को गठन के वक़्त इस तरह की रियायतें देने से मना कर दिया गया था.
जयललिता ने मोदी सरकार की ओर से अधिकारियों को सोशल मीडिया पर हिंदी के इस्तेमाल को वरीयता देने और संस्कृत सप्ताह मनाने का भी विरोध किया था.
उन्होंने अपने राज्य के हज यात्रियों के लिए अधिक कोटे की मांग की थी.
तो ऐसा क्या है जिसने जयललिता को एक महीने में पांच से छह चिट्ठियां लिखने पर मज़बूर कर दिया है?
राजनीतिक विश्लेषक जी सत्यमू्र्ती ने बीबीसी हिंदी को बताया, "वे स्पष्ट रूप से यह बतलाना चाहती हैं कि तमिल लोगों की राज्य में असल हिमायती वही हैं. उन्हें तमिल खेमे को शिकस्त देना है, जिसमें डीएमके, डीएमडीके और पीएमके शामिल हैं."
अच्छी परंपरा
राजनीतिक टिप्पणीकार ज्ञानी शंकरन कहते हैं, "इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. लोकतंत्र में राज्य की शिकायत दर्ज करने का यह एक अच्छी परंपरा है. और भारत जैसे विशाल देश में यह संभव नहीं है कि प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से हर बात पर नहीं मिल सकते हैं."
लेकिन एक चिट्ठी को छोड़कर बाकी चिट्ठियों का कोई जवाब नहीं आया. यह एक चिट्ठी फ़ादर एलेक्सीस प्रेम कुमार के अफ़ग़ानिस्तान में अगवा करने के मामले में थी.
शंकरन ने कहा, "वह अपने ज्ञापन में उठाए गए मुद्दों को अपने चिट्ठियों में दोहरा सकती हैं क्योंकि उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है. सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय उनके मेल को स्पैम मेल की तरह मानता है."
जवाब की उम्मीद
उनकी हताशा डॉक्टर मनमोहन सिंह को लिखे एक ख़त में दिखती है. 31 नवंबर, 2013 को लिखे ख़त में उन्होंने भारत में श्रीलंका के नौसैनिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और युद्धपोतों की आपूर्ति पर आपत्ति दर्ज की थी.
इस मसले पर 16 जुलाई, 2012, 25 अगस्त, 2012, 28 अगस्त, 2012 और छह जून, 2013 को लिखे पत्रों का हवाला भी इस चिट्ठी में दिया गया है.
इस चिट्ठी का अंत इस एक पंक्ति से होता है, "क्या मैं इन चिट्ठियों के जवाब में एक लाइन के उत्तर की उम्मीद कर सकती हूं?"
लेकिन मोदी को मछुआरों की समस्याओं पर लिखी चिट्ठियों में वो आक्रमकता नहीं दिखाती हैं. लड़ने का जज़्बा वही है लेकिन अपेक्षाकृत अधिक सहयोगात्मक है.
इसका मामले में एक ही अपवाद है जब श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया था उन्होंने कहा था, "यह तमिलों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है."
इस साल जून और अगस्त के बीच उन्होंने मोदी को 27 पत्र लिखे हैं जबकि डॉक्टर मनमोहन सिंह को अक्तूबर, 2013 और अप्रैल, 2014 के बीच 21 पत्र लिखे थे.
तमिलनाडु के मछुआरों को श्रीलंका अक्सर गिरफ़्तार कर लेता है और उनकी नावों को ज़ब्त कर लेता है.
जयललिता ने ऊर्जा क्षेत्र, कावेरी जल विवाद, मुल्लापेरियार बांध, उर्वरक, वस्तु एवं सेवा कर का विरोध, रघुराम राजन पैनल की रिपोर्ट की मांग ख़ारिज करने जैसे मु्द्दे भी उठाए हैं.
विरोध
रघुराम राजन पैनल की रिपोर्ट 14वीं वित्त आयोग की रिपोर्ट का उल्लंघन करती है जो राज्यों के लिए संसाधन का प्रावधान करती है और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को रियायतें देती है जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ को गठन के वक़्त इस तरह की रियायतें देने से मना कर दिया गया था.
जयललिता ने मोदी सरकार की ओर से अधिकारियों को सोशल मीडिया पर हिंदी के इस्तेमाल को वरीयता देने और संस्कृत सप्ताह मनाने का भी विरोध किया था.
उन्होंने अपने राज्य के हज यात्रियों के लिए अधिक कोटे की मांग की थी.
तो ऐसा क्या है जिसने जयललिता को एक महीने में पांच से छह चिट्ठियां लिखने पर मज़बूर कर दिया है?
राजनीतिक विश्लेषक जी सत्यमू्र्ती ने बीबीसी हिंदी को बताया, "वे स्पष्ट रूप से यह बतलाना चाहती हैं कि तमिल लोगों की राज्य में असल हिमायती वही हैं. उन्हें तमिल खेमे को शिकस्त देना है, जिसमें डीएमके, डीएमडीके और पीएमके शामिल हैं."
अच्छी परंपरा
राजनीतिक टिप्पणीकार ज्ञानी शंकरन कहते हैं, "इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. लोकतंत्र में राज्य की शिकायत दर्ज करने का यह एक अच्छी परंपरा है. और भारत जैसे विशाल देश में यह संभव नहीं है कि प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से हर बात पर नहीं मिल सकते हैं."
लेकिन एक चिट्ठी को छोड़कर बाकी चिट्ठियों का कोई जवाब नहीं आया. यह एक चिट्ठी फ़ादर एलेक्सीस प्रेम कुमार के अफ़ग़ानिस्तान में अगवा करने के मामले में थी.
शंकरन ने कहा, "वह अपने ज्ञापन में उठाए गए मुद्दों को अपने चिट्ठियों में दोहरा सकती हैं क्योंकि उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है. सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय उनके मेल को स्पैम मेल की तरह मानता है."
जवाब की उम्मीद
उनकी हताशा डॉक्टर मनमोहन सिंह को लिखे एक ख़त में दिखती है. 31 नवंबर, 2013 को लिखे ख़त में उन्होंने भारत में श्रीलंका के नौसैनिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और युद्धपोतों की आपूर्ति पर आपत्ति दर्ज की थी.
इस मसले पर 16 जुलाई, 2012, 25 अगस्त, 2012, 28 अगस्त, 2012 और छह जून, 2013 को लिखे पत्रों का हवाला भी इस चिट्ठी में दिया गया है.
इस चिट्ठी का अंत इस एक पंक्ति से होता है, "क्या मैं इन चिट्ठियों के जवाब में एक लाइन के उत्तर की उम्मीद कर सकती हूं?"
लेकिन मोदी को मछुआरों की समस्याओं पर लिखी चिट्ठियों में वो आक्रमकता नहीं दिखाती हैं. लड़ने का जज़्बा वही है लेकिन अपेक्षाकृत अधिक सहयोगात्मक है.
इसका मामले में एक ही अपवाद है जब श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया था उन्होंने कहा था, "यह तमिलों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है."


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