दिग्विजय सरकार के भ्रष्टाचार में अभियोजन की मंजूरी नहीं दे रही शिवराज सरकार
भोपाल। 20 साल पहले दिग्विजय सिंह शासन काल में मप्र ऊर्जा विकास निगम द्वारा वर्ष 1997-98 में राजगढ़ जिले में 12000 उन्नत चूल्हों का वितरण कागजों में करने के मामले में अभी तक आरोपी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकी है। निगम की शिकायत पर राजधानी के हबीबगंज थाना पुलिस ने भ्रष्टाचार की जांच की, जिसमें निगम के अधीक्षण यंत्री श्रीकांत देशमुख समेत 11 आरोपियों के नाम शामिल हैं। जिनके के खिलाफ पुलिस ने अभियोजन की मंजूरी के लिए 12 साल पहले निगम को पत्र लिखा, लेकिन निगम ने अभी तक मंजूरी ही नहीं दी है।
ऊर्जा विकास निगम द्वारा राजगढ़ जिले में धुआं रहित चूल्हे बांटने में फर्जीबाड़ा किए जाने की शिकायत निगम के तत्कालीन अधिकारी पीयू कुलकर्णी ने 26 फरवरी 2002 को हबीबगंज थाने में दर्ज कराई थी। इसके संबंध में पुलिस ने अंतिम जांच प्रतिवेदन 26 दिसंबर 2015 में भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 13 (1) डी और 13 (2) का दोषी श्रीकांत देशमुख एवं अन्य को पाया। इस संबंध में अभियोजन की मंजूरी के लिए निगम को पत्र लिखा जा चुका है, लेकिन निगम के अफसरों ने भ्रष्ट अफसरों को बचाने की मंशा से पुलिस से पूछा है कि जांच में आला अधिकारी ही दोषी कैसे पाए गए हैं। निगम ने इसी तथ्य को आधार बताकर अभियोजन की मंजूरी नहीं दी है।
इस संबंध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक शिकायत की गई है। जिसमें बताया गया है कि ऊजा निगम के अधीक्षण यंत्री श्रीकांत देशमुख पर प्रायवेट फर्म के साथ सांठ-गांठ करने के आरोप हैं। आरोप है कि 30 जनवरी 1987 को मैसर्स सूर्या ज्योति लिमिटेड नई दिल्ली से 7 लाख 20 हजार रुपए के एसपीव्ही सिस्टम आयात करने में आयात कर की छूट दी गई। जिसमें देशमुख ने पद का दुरुप्रयोग किया। आर्थिक अनियमितताओं के चलते 8 दिसंबर 2005 को देशमुख को अधीक्षण यंत्री से कार्यपालन यंत्री बना दिया गया था। लेकिन 10 साल बाद वर्ष 2015-16 में देशमुख को निर्दाष मानते हुए फिर से अधीक्षण यंत्री बना दिया गया। जबकि विभाग की कमेटी देशमुख पर आरोप साबित सही मान चुकी है। शिकायत में भ्रष्टाचार, प्रमोशन करने की नस्तियों की जांच की मांग की गई है।
मप्र ऊर्जा विकास निगम के अध्यक्ष बिजेन्द्र सिंह सिसौदिया का कहा है कि यह मामला मेरी जानकारी में नहीं है। आप निगम के एमडी से ही पूछ लें। उन्हें इसकी जानकारी होगी।
सरकार ने तय की समय-सीमा
भ्रष्टाचार के मामले में विभागों द्वारा अभियोजन की स्वीकृति नहीं देने के मामले में हाल ही में राज्य सरकार ने तय किया है कि 45 दिन के भीतर अभियोजन की मंजरी दी जाएगी। अब विधि विभाग नहीं, संबंधित विभाग की अभियोजन की मंजूरी देंगे। यहां बता दें कि लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू की ओर से यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि सरकार भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने में लेटलतीफी करती है। इसके बाद यह फैसला लिया गया है।

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