सोशल मीडिया के मोर्चे पर ‘शिवराज’ के प्रबंधनकर्ता फेल!
(राकेश अग्निहोत्री) “सवाल दर सवाल”
(सड़क को लेकर सात समुंदर पार हवा से लेकर सड़क तक घमासान…)
शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका दौरे के दौरान वहां की सड़कों की तुलना में मध्यप्रदेश की सड़कों को बेहतर क्या बताया सोशल मीडिया पर जो माहौल बना उससे लगा कि मुख्यमंत्री ने मानो ‘खुजा के खता’ कर ली। गलती शिवराज के बोलने से हुई या फिर उस मीडिया टीम से जिसने पलक झपकते से वायरल कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया जिस के समर्थन और पक्ष में ना तो सरकार का नेटवर्क और ना ही संगठन के नेता और कार्यकर्ता की दलील लोगों के गले उतरी ।इस बवाल में कूदे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने भी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जिस तरह शिवराज के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की मांग कर डाली उसने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया। भाजपा इस मोर्चे पर भी मध्यप्रदेश की अस्मिता को जोड़कर विरोधियों को जनता की नजर में बेनकाब नही कर पाई। शिवराज मध्यप्रदेश की तारीफ करने के साथ जब अमेरिका की बुराई उसके अपने देश में कर रहे थे तब भारत में सोशल मीडिया के मोर्चे पर शिवराज पर व्यंग्य-कटाक्ष के साथ उनके विरोधी मुखर हो रहे थे। तब बीजेपी के जिन रणनीतिकारों चाहे वो सरकार से जुड़े हों या फिर भाजपा संगठन से, मीडिया से जुड़े हों या फिर सोशल मीडिया के कर्ताधर्ता या आईटी सेल से, को जिस तरह शिवराज के बचाव में सामने आना चाहिए था वह नजर नहीं आए। तो फिर यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि सोशल मीडिया के मोर्चे पर सत्ता और संगठन से जुड़े टीम शिवराज के प्रबंधनकर्ता और रणनीतिकार आखिर फेल क्यों साबित हुए? देश की सबसे मजबूत और ज्यादा कार्यकर्ताओं वाली भाजपा हो या फिर सरकारी प्रबंधनकर्ता उन्हें शिवराज को जिस तरह ताकत देना चाहिए थी वह उनके बचाव में भी नहीं उतरे। यह सच है कि कुछ गिने-चुने नेताओं और प्रवक्ताओं ने मोर्चा संभाला लेकिन संगठन के प्रादेशिक और केंद्रीय पदाधिकारियों के साथ केंद्रीय मंत्री और शिवराज के कैबिनेट मंत्रियों को जिस तरह सामने आकर पलटवार कर जवाब देना चाहिए था वह कम से कम पहले 24 घंटे में तो बिल्कुल नजर नहीं आया। तो फिर बड़ा सवाल मोदी और शाह की मंशा के अनुरूप मध्यप्रदेश में सोशल मीडिया पर बीजेपी की सक्रियता यदि नजर नहीं आई तो फिर इसकी वजह क्या है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
आखिर जिन्हें नहीं पता था कि शिवराज सिंह चौहान इन दिनों अमेरिका दौरे पर हैं उन्हें भी अब यह जानकारी मिल चुकी है कि मुख्यमंत्री अमेरिका में अपने मध्यप्रदेश की सड़कों की तारीफ कर यदि विवादों के साथ सुर्खियों में आ गए तो फिर उसकी वजह क्या है। जितनी चर्चा शिवराज के फेसबुक लाइव के कारण नहीं हुई और ना ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय के व्याख्यान की राजधानी के अखबार और रीजनल चैनलों में जो स्थान मिला वह शायद भाजपा के प्रबंधनकर्ताओं के लिए पर्याप्त था ।लेकिन जैसे ही शिवराज ने वॉशिंगटन की सड़कों की तुलना मध्यप्रदेश की सड़कों से कर अपनी सरकार की महान उपलब्धियों को सामने रखा तो तुरंत विवाद खड़ा हो गया। जिस ट्वीटर पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते आनंदीबेन पटेल ने इस्तीफा दिया था उसे फोरम पर तो मानो शिवराज को निपटाने की होड़ सी लग गई। रीजनल और नेशनल न्यूज चैनलों के साथ सोशल मीडिया पर इसके साथ जो तस्वीरें सामने आईं और बहस का मुद्दा बन गया उसने पुरानी यादें ताजा कर दी। चाहे फिर वह पन्ना में आई बाढ़ के दौरान हाथों पर शिवराज को पानी से दूर ले जाने की तस्वीर हो या फिर उनके अपने विदिशा से लेकर प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में बदहाल सड़कों की तस्वीर इस तरह परोसी गई जैसे मध्यप्रदेश 2003 के दौर में लौट चुका हो जब बिजली पानी के साथ सड़क को एक बड़ा चुनावी मुद्दा खुद बीजेपी ने बना दिया था। एक और तस्वीर तो दूसरी ओर जिम्मेदार नेताओं के ट्वीट और बयान चाहे फिर वह प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या फिर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सबके निशाने पर शिवराज आ चुके थे। मध्यप्रदेश से यदि मंत्री रामपाल सिंह के बयान को छोड़ दिया जाए तो फिर दूसरे मंत्री और संगठन के पदाधिकारियों के साथ आईटी और मीडिया विभाग से जुड़े जिम्मेदार नेता सोशल मीडिया के मोर्चे पर चाह कर भी शिवराज का बचाव नहीं कर पाए। बीजेपी संगठन की ओर से समय रहते पलटवार प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल की ओर से सामने आया तो दूसरे नेताओं के बयान चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाए। भाजपा के वो नेता जो शिवराज से लेकर मोदी और शाह के साथ अपनी फोटो चस्पा कर सोशल मीडिया पर अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहते हैं वह भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बचाव में तथ्य और आंकड़ों के साथ सामने नहीं आए। सरकारी मीडिया हो या फिर भाजपा के आईटी सेल की निष्िक्रयता दिनभर चर्चा का विषय बनी रही। कुछ सक्रियता दिखी तो अपनी शिवराज सरकार की उपलब्धियों को सामने लाने की बजाय अमेरिका की सड़क के गड्ढे दिखाने में।इस दौरान या तो नेताओं के पास जवाब नहीं था या फिर वह यह समझ रहे थे और व्यक्तिगत बातचीत में कह भी रहे थे कि शिवराज को अमेरिका जाकर ऐसे विवादित बयान से बचना चाहिए था। जिम्मेदार पदों पर बैठे नीति निर्धारक हों या कार्यकर्ता और शिवराज के राज में पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और बहुत कुछ कमाने वालों को जिस तरह खुलकर हर मोर्चे पर सामने आना चाहिए था वह नजर नहीं आए। सोशल मीडिया से आगे शाम ढले सड़क का यह मुद्दा न्यूज चैनलों की बहस का हिस्सा भी बन गया तो अखबार की सुर्खियां बनना भी तय है। ट्विटर से लेकर फेसबुक और वॉट्सएप पर जब शिवराज के खिलाफ हमले तेज हो रहे थे तब भाजपा के रणनीतिकारों की चुप्पी मायने रखती है तो कुछ सवाल भी खड़े करती है। दरअसल चित्रकूट उपचुनाव में जिन नेताओं को शिवराज की गैर मौजूदगी में डैमेज कंट्रोल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी वहां भी उनका दांव उल्टा पड़ता नजर आ रहा था चाहे फिर वह मंगल सिंह के पाला बदलने से जुड़ा हो या फिर जिनका टिकट काट दिया गया उनके मान-मनौव्वल से जुड़ा हो। शिवराज की कमी प्रदेश भाजपा को खल रही थी क्योंकि गुजरात की हवा चित्रकूट में भी फैलती नजर आ रही थी। यह पहला मौका नहीं है जब शिवराज विवादों में आए हों लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज की ब्रांडिंग से जुड़े कर्ता-धर्ता भी इन विपरीत परिस्थितियों में न जाने मैदान छोड़कर कहां चले जाते हैं। जिस भाजपा का जिला स्तर तक आईटी सेल काम कर रहा हो, जिस भाजपा के पास सबसे ज्यादा कार्यकर्ता मौजूद हैं आखिर वो अपनी जिम्मेदारी से क्यों बचते नजर आई यह समझ से परे है। राजधानी में मौजूद बीजेपी के कई बड़े नेता मीडिया से इस मामले में कुछ भी कहने से बचते नजर आए खासतौर से वह जो हर छोटे-मोटे बयान पर बढ़-चढ़कर बात करते रहे। बीजेपी मीडिया सेल से जुड़े प्रवक्ताओं की लंबी टीम में गिने-चुने चेहरे ही हैं जिनकी त्वरित और आक्रामक प्रतिक्रिया देखने और सुनने को मिलती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सोशल मीडिया पर सांसद, मंत्री, विधायक, पार्टी के पदाधिकारियों की प्रभावी मौजूदगी सुनिश्चित करने के जो दिशा निर्देश दिए थे शिवराज के अमेरिका दौरे के दौरान सड़क को लेकर मचे बवाल के समय वो सब अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। क्योंकि अरुण यादव की विवादित टिप्पणी को भी भाजपा नहीं भुना पाई जिसमें अपने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ अमेरिका में कार्रवाई की मांग कर अरुण यादव ने पूरी बहस को मानो एक नया मोड़ दे दिया। सीएम इन वेटिंग के दावेदारों में से एक ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरे नेताओं के बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में सड़क यदि फिर चुनाव में बड़ा मुद्दा बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अरुण यादव ने अपने ट्वीट में कहा, अमेरिका से बेहतर मध्यप्रदेश की ‘चकाचक’ सड़कों का लुत्फ उठाते प्रदेशवासी, क्यूं ना सिर्फ एक बार शिवराज को इन सड़कों पर हिलोरें दे दे कोई… शिवराज जी ने अमेरिका का उसी की जमीं पर बदतर सड़कों को लेकर अपमान किया है। मिस्टर ट्रप आप इनके विरुद्ध अपने कानूनों के तहत प्रकरण दर्ज करें। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट किया, कोई इनकी आंखों से पट्टी उतारे, मुख्यमंत्री आंखें खोलें और सच का सामना करें। आम आदमी पार्टी ने कहा, मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से उतरकर सड़क पर सफर करें, तब सच्चाई का पता चलेगा। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा, भाजपा के नेता मसखरा! मुझे आश्चर्य है कि वे विदेशों में इतने घमंड क्यों करते हैं?जिस तरह सड़क को लेकर बवाल खासतौर से सोशल मीडिया पर शिवराज की फजीहत करने का मानो उनके विरोधियों को मिल गया और सरकार और संगठन से जुड़े उनके समर्थकों को मानो सांप सूंघ गया, वो कुछ सवाल जरूर खड़े करता है। एक दिन पहले ही भावांतर योजना और किसानों को लेकर एक साथ आधा दर्जन अधिकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नजर आए थे। क्या सड़क के मुद्दे पर शिवराज की बात पर मोहर लगाने के लिए मंत्री और अधिकारी इसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी सरकार की उपलब्धियों को सामने नहीं रख सकते थे। कहीं ये अधिकारियों के बीच गुटबाजी और नेताओं के बीच समन्वय के अभाव का नतीजा तो नहीं है जो शिवराज नहीं तो कोई फैसले लेने के लिए अधिकृत नहीं या फिर कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते या इस जमात में कुछ जिम्मेदार लोग अपने सियासी हित साध रहे हैं। क्या भाजपा नेताओं और मंत्रियों में शिवराज की गैरमौजूदगी में विरोधियों को जवाब देने का माद्दा नहीं रह गया। शिवराज की इससे पहले इतनी फजीहत मीडिया के मोर्चे पर तो कभी नहीं हुई। जब शिवराज को सरकार और संगठन के अपने सहयोगियों की जरूरत थी तब चित्रकूट उपचुनाव के दौरान पाला बदल रहे मंगल सिंह की फोटो वायरल करने में पूरी पार्टी ताकत लगा रही थी। लेकिन शिवराज के समर्थन और विरोधियों को सबक सिखाने में संगठन के कर्ताधर्ता सिर्फ औपचारिकता तक सीमित होकर रह गए तो आखिर इसकी वजह क्या है। क्या तीन शिवराज के रणनीतिकार चाहे फिर वह नेता हो या अधिकारी उन्होंने मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में यदि उन्हें विवादों से बचाने के लिए यदि डैमेज कंट्रोल में रुचि नहीं ली तो इसकी वजह आखिर क्या? बड़ा सवाल सड़क को लेकर मचे बवाल से क्या शिवराज बैकफुट पर आ गए हैं और किसान समेत दूसरे मुद्दे कम से कम चित्रकूट उपचुनाव में पीछे छूट जाएंगे? ट्वीटर पर मुख्यमंत्री के बयान के साथ ‘विकास का मामा पागल हो गया’ हैसटेग करने लगा। इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है जिसने पिछले दिनों सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के चर्चित शो केबीसी में शिवराज को मामा के तौर पर देश और विदेश में नई पहचान दिलाई आखिर इस बवाल में ऐसी कौन सी चूक हुई जिसने मुख्यमंत्री की भद पिटवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या इसके लिए अमेिरका में उनके साथ मौजूद वो एजेंसी जिम्मेदार नहीं है जो उनकी ब्रांडिंग के लिए अमेरिका गई थी लेकिन उनकी फजीहत का कारण बन गई। क्योंकि वहां से भेजे गए कुछ फोटोग्राफ्स भी चर्चा में हैं।
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