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आदिवासी कृषकों का कृषि यंत्रों के उपयोग की ओर बढ़ता रुझान

आदिवासी कृषकों का कृषि यंत्रों के उपयोग की ओर बढ़ता रुझान

अनूपपुर/ प्रदीप मिश्रा - 8770089979

मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा अनूपपुर जिला आदिवासी अंचल है। जिले का पुष्पराजगढ़ जनपद आदिवासी बाहुल्य है। जहाॅं के अधिकतर के किसान परम्परागत एवं देशी पद्धति से धान-गेहूॅं एवं चने की खेती करते आ रहे हैं। आज भी अधिकतर किसान छिटकवा पद्धति का प्रयोग करते नजर आते हैं। रासायनिक उवर्रक का प्रयोग नहीं के बराबर किया जाता है। जिसके कारण किसानों को उपज बहुत कम मिलती है। पुष्पराजगढ़ जनपद के ग्राम तिवारीटोला निवासी आदिवासी कृषक श्री धनराज सिंह पिता श्री घूमन सिंह के पास 02 हेक्टेयर जमीन है। विगत वर्षों तक आप भी परम्परागत तरीके से खेती करते थे। एक दिन कृषि विभाग के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी श्री ए.एस. नेताम ने किसान खेत पाठशाला के माध्यम से किसानांे को श्री पद्धति तथा रासायनिक उर्वरक एवं कृषि यंत्रों के प्रयोग के संबंध में जानकारी दी। यह जानकारी कृषक धनराज के लिए वरदान सिद्ध हुई। उन्होंने धान की खेती में जहाॅं उन्नत तकनीक श्री पद्धति का प्रयोग किया, वहीं कृषि यंत्र शीड ड्रिल, मार्कर, कोनोवीडर जैसे यंत्र अनुदान पर प्राप्त किए तथा कम्पोस्ट एवं नाडेप विधि से तैयार जैविक खाद का प्रयोग किया। कृषक धनराज सिंह का कहना है, कि पूर्व में उन्नति खेती एवं साधनों की कमी के कारण वे परम्परागत तरीके से खेती करते थे। खेत में कच्ची गोबर की खाद डालने से जहाॅं दीमक तथा कीटब्याधि का प्रकोप हो जाता था। वहीं निदाई-गुड़ाई करने में भी अधिक व्यय होता था। कृषि विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न प्रशिक्षणों के माध्यम से जब मुझे उन्नति कृषि तकनीक की जानकारी मिली, तो हमने भी उसे अपनाने का निर्णय लिया। कृषि विभाग द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन अंतर्गत अनुदान पर सीड ड्रिल तथा कोनोवीडर उपलब्ध करा दिया गया। सीड ड्रिल से गेहूॅं, चना आदि की कतार में हमने बुवाई की। स्वयं के खेत के अलावा दूसरे किसानों के खेत में भी सीड ड्रिल से बुवाई कर 10 हजार रुपए की अतिरिक्त आय प्राप्त की। पूर्व में जहाॅं हम अपने साल भर के खाने के लिए भी अनाज पैदा नहीं कर पाते थे। वहीं आज हम लगभग 100 क्विंटल अनाज बाजार में बेचने में सफल हुए। अब हम अपने 02 हेक्टेयर जमीन में खरीफ में धान तथा रबी में गेहूॅं, चना, मसूर तथा अलसी की खेती करते हैं। इस जमीन से लगभग 2 लाख रुपए वार्षिक आय प्राप्त होने लगी हैं। आज मेरी पहचान इस क्षेत्र के प्रगतिशील कृषकों में होती है। गाॅंव के अन्य कृषक भी मुझसे कृषि से संबंधित जानकारी व सलाह लेते हैं। आर्थिक क्षेत्र में उन्नति के साथ ही सामाजिक क्षेत्र में भी साख बनी है। प्रदेश सरकार की कृषि नीति ने ये अवसर मुझे उपलब्ध कराए हैं। जिसके लिए मैं प्रदेश सरकार के प्रयासों तथा कृषि विभाग के अमले को धन्यवाद देता हूॅं।

                                    

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