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जनजातियों की समस्याओं का निवारण शिक्षा से संभव आईजीएनटीयू में हिंदी विभाग की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

जनजातियों की समस्याओं का निवारण शिक्षा से संभव

आईजीएनटीयू में हिंदी विभाग की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

अमरकटंक/ प्रदीप मिश्रा - 9425471320

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 21वीं सदी में आदिवासी समाज-साहित्य लेखन की चुनौतियां और संभावनाएं शुक्रवार को संपन्न हो गई। इस अवसर पर हिंदी में साहित्य लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रमुख शिक्षाविदों ने महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए नए लेखकों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। मुंबई विश्वविद्यालय के प्रो. विष्णु आर. सरवदे ने जनजातियों तक विज्ञान की शिक्षा को पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय  समाज की समस्याओं का निवारण शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। जेएनयू, नई दिल्ली के प्रो. राम चंद्र ने दलित लेखन एवं संघर्ष और जनजातीय  लेखन एवं संघर्ष की तुलना करते हुए बताया कि जनजातीय समाज को अभी भी सामाजिक नायकों की जरूरत है जो उनकी चुनौतियों का सामयिक निराकरण कर सके। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के साहित्य में निरंतर बदलाव हो रहा है। आदिवासियों को शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा एवं उनके कठोर सत्य को लिखना होगा। इसमें गैर आदिवासियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कुलपति प्रो. टी.वी. कटटीमनी ने जनजातियों की मुख्य समस्या मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप को बताया। उनका कहना था कि जनजातियों की समय के साथ प्राथमिकता बदल रही हैं यह परिवर्तन साहित्य में भी झलकना चाहिए। उनके साहित्य को समृद्ध बनाने की आवश्यकता है। दो दिवसीय संगोष्ठी में साहित्य की अवधारणा, आदिवासी साहित्य, भूमंडलीय विकास की अवधारणा और आदिवासी समाज, आदिवासी कला और आदिवासी एवं अन्य परिवर्तनकामी साहित्य का संबंध जैसे ज्वलंत विषयों पर देशभर के प्रमुख शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर डॉ. जी.वी. रत्नाकर लिखित कविता संकलन मिट्टी की पाटी का विमोचन भी किया गयज्ञं संगोष्ठी का आयोजन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सहयोग से किया गया। संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. नीलम, विनोवा भावे विश्वविद्यालय से फ्रांसिसका कुजुर, रांची से डॉ. अंजुला सांगा, आईजीएनटीयू से प्रो. किशोर गायकवाड़, डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह, डॉ. आशुतोष कुमार सिंह, डॉ. वीरेंद्र प्रताप, अभिलाषा एलिस तिर्की, डॉ. तौसिफ उर रहमान आदि ने भाग लिया। संगोष्ठी के निदेशक प्रो. खेमसिंह डहेरिया थे। संयोजन डॉ. प्रवीण कुमार ने किया। समन्वय प्रो. रेनू सिंह का रहा।


1 comment

Kailash said...

Nice informations sir

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