डीजल 4 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की सिफारिश
नई दिल्ली। अगर 1 साल के बाद डीजल की कीमतें बढ़कर
75 रुपये लीटर तक पहुंच जाएं तो आप चौंकिएगा नहीं। पेट्रोलियम मंत्रालय की
किरीट पारेख कमिटी ने डीजल के दाम फौरन 4 रुपये लीटर बढ़ाने की सिफारिश की
है। हालांकि जिस तरह से सियासी पारा चढ़ रहा है उसे देखते हुए इन सुझावों का
लागू हो पाना मुश्किल है। किरीट पारिख जल्द ही अपनी रिपोर्ट पेट्रोलियम
मंत्रालय को सौंपेगे।
सब्सिडी के बोझ से सरकार को
पूरी तरह से आजाद कराने का नुस्खा किरीट पारेख पैनल ने दे दिया है। समिति
ने सुझाव दिया है डीजल तुरंत 4 रुपये लीटर महंगा कर दिया जाए और इसके बाद
हर महीने कीमतों में 1 रुपये की बढ़ोतरी की जाए। किरीट पारेख पैनल का मानना
है कि कीमतों को अचानक से पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
पैनल के मुताबिक सब्सिडी के बोझ को खत्म करने की प्रक्रिया में 2 से 3 साल
का वक्त लगाना चाहिए।
वित्त मंत्रालय काफी समय से
डीजल की कीमतों को एक्सपोर्ट प्राइसिंग पैरिटी के आधार पर तय करने की मांग
करता रहा है, लेकिन किरीट पारेख पैनल ने जोर देकर कहा है कि अभी मौजूदा
ट्रेड प्राइसिंग पैरिटी के आधार पर ही कीमतें तय होनी चाहिए। गौर करने वाली
बात ये है कि एक्सपोर्ट पैरिटी के बाद कस्टम ड्यूटी पूरे वॉल्यूम पर नहीं
लगेगी और नए कैलकुलेशन में तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी कम दिखेगी और
बैलेंस शीट पर 3,000-4,000 करोड़ रुपये के चोट का अनुमान है। लिहाजा
कंपनियां भी ऐसा नहीं चाहती हैं।
किरीट पारेख पैनल ने
सिफारिश की है कि 3 साल के भीतर रसोई गैस और केरोसिन की कीमतें भी पूरी
तरह से बाजार के हवाले छोड़ देना चाहिए। पीडीएस केरोसिन के दाम पैनल ने
तुरंत 2 रुपये बढ़ाने की सिफारिश की है। साथ ही कहा है कि एलपीजी सिलिंडर की
कीमतें सब्सिडी का एक चौथाई मार्च 2014 से पहले बढ़ा देना चाहिए। ये बढ़ोतरी
करीब 100 रुपये की होगी और उसके बाद सिलिंडर की कीमतें बची हुई सब्सिडी का
25 फीसदी हर साल बढ़ाना चाहिए ताकि एलपीजी की कीमतें भी पूरी तरह से बाजार
के हवाले की जा सकें।
ये सिफारिशें कच्चे तेल की
कीमतों में उछाल और देश की आर्थिक हालात को देखते हुए की गई हैं। लेकिन
राजनैतिक हालात अभी इन सिफारिशों को लागू नहीं होने देंगे, ये करीब-करीब तय
है। अभी 3 दिन पहले ही पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी कहा था कि
डीजल हाल-फिलहाल महंगा करने का इरादा नहीं है। इशारा साफ है कि 2014 से
पहले सरकार ऐसा कोई कड़ा कदम नहीं उठाना चाहेगी जो उसके वोट बैंक में सेंध
लगा सके।

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