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शहीद-ए-आजम भगत सिंह को शत शत नमन

नई दिल्ली : मादर-ए-हिंद का सपूत शहीद-ए-आजम भगत सिंह की आज जयंती है. इस 17 साल के युवा ने अपनी धरती मां को आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की बलि दे दी. भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 में गांव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था. ये एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपनाया था.

उनके परिवार पर आर्य समाज और महर्षि दयानन्द की विचारधारा का गहरा प्रभाव था. अधिकांश क्रांतिकारियों को देश प्रेम की प्रेरणा महर्षि दयानन्द के साहित्य व आर्य समाज से मिली. अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था. लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की.

23 मार्च,1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी पर लटका दिया गया. सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया. उनके जीवन पर अनेक फिल्में बनी. कुछ फिल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं जैसे - द लीज़ेंड ऑफ़ भगत सिंह. मनोज कुमार की फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है. काकोरी काण्ड में 4 क्रान्तिकारियों को फांसी और 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन. पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद और पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की. इन सभी बम धमाको के लिए उन्होंने वीर सावरकर के क्रांतिदल अभिनव भारत की भी सहायता ली और इसी दल से बम बनाने के गुर सीखे.

भगत सिंह जब 17 वर्ष के थे, तो 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में उन्होंने हिस्सा लिया था. कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'मतवाला' में उन्होंने एक लेख लिखा था और उसी लेख को इस प्रतियोगिता में भेज दिया. भगत सिंह को इस लेख के लिए 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार मिला था.

आधुनिक विश्व में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने सरदार भगत सिंह की तरह कम उम्र में ही अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने का प्रयास किया हो. भगत सिंह बुद्धिजीवी थे, लेकिन शहीद-ए-आजम का ये पक्ष अब तक अप्रचारित है. उनके उज्ज्वल व्यक्तित्व के इस पहलू की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो स्वयं को भगत सिंह की परंपरा के ध्वजवाहक कहते हैं.

भगत सिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था. भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह विचारक, लेखक और देशभक्त नागरिक थे. उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त थे. उनका भगत सिंह के जीवन पर गहरा असर पड़ा. लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगत सिंह ने दीमक की तरह चाट डाली थी. पुस्तकालय प्रभारी ने कहा था कि भगत सिंह किताबों को पढ़ता नहीं था, वह तो निगलता था. भगत सिंह को फांसी होने वाली थी, फिर भी वो अपने अंतिम समय तक रोज किताबें पढ़ रहे थे. भगत सिंह मृत्युंजय थे.

भगत सिंह को हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भाषा भी आती थी, जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी. जेल में भगत सिंह करीब दो साल रहे. इस दौरान वो लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे. जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा. जेल प्रवास के दौरान उनके लिखे लेख और सगे-संबंधियों को लिखे पत्र वस्तुत: उनके विचारों के दर्पण हैं.

भगत सिंह मानते थे कि केवल अंग्रेजों के चले जाने से देश की आजादी का सपना पूरा नहीं हो सकता. केवल गोरे साहबों के स्थान पर भूरे साहबों का शासन होने से देश की बहुसंख्यक गरीब जनता का भला नहीं होने वाला है. इसलिए भगत सिंह ने समाजवादी विचारों का प्रचार करने और देश में समाजवादी शासन की स्थापना का सपना देखा.

क्रांतिकारी भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को मात्र 23 वर्ष की अवस्था में फांसी दे दी. वो शहीद-ए-आजम कहलाए और आज भी लाखों युवाओं के दिल में बसते हैं.

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