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सरकारी अस्पतालों में टेस्ट में मशक्कत, रिपोर्ट में इंतजार

कटनी। ऊंची डिग्री, काबिल चिकित्सक, भरपूर साधन संसाधन और सेवाओं के बदले पर्याप्त पगार मिलने के बावजूद शासकीय चिकित्सालयों में न तो मरीजों के प्रति स्टाफ का असंवेदशीलता वाला रवैया बदल रहा है न ही न ही मरीजों को चिकित्सा सेवाओं से संतुष्टि मिल पा रही। सरकारी स्कूलों की तरह सरकारी अस्पताल भी महज कमजोर तबके या जरूरतमंदों के इलाज तक ही सीमित होकर रह गये है। जिले के सबसे बड़े जिला चिकित्सालय में ही रोगी सुविधाओं का आलम यह है कि सोनोग्राफी के लिये एक सप्ताह से एक पखवाड़े तक रूकना पड़ रहा है जबकि पैथालॉजी रिपोर्ट भी अगले दिन ही सार्थक हो पाती है।  दरअसल टालमटोल सेवाओं वाली बनी सरकारी अस्पतालों की छबि में कोई सुधार नही हो पा रहा है। पर्ची कटाने से लेकर दवाईयां प्राप्त करने तक में लंबी कतार की परेशानी तो फिर भी चलती है लेकिन सबसे ज्यादा पीड़ा मरीजो को तब और हो जाती है  तब अपनी बीमारी या चोट का इलाज कराने दूर दूर से बमुश्किल साधनो का जुगाड़ कर अस्पताल पहुंचकर डाक्टरो के  सामने पहुंचे मरीज का वगैर समुचित परीक्षण किये ही दो चार टैबलैट लिखकर टरका दिया जाता है। जिला चिकित्साकय में कहने के लिये तो सभी तरह का इलाज होता है लेकिन बिगड़ा बुखार भी यहां से ठीक हो पाना टेड़ी खीर है। 

आमतौर पर साधन सम्पन्न व्यक्ति सरकारी अस्पताल पहुंचता भी नही। बीमार गरीब मरीजो को यहां तमाम तरह की यातनायें झेलनी पड़ रही है।  अस्पताल के सोनोग्राफी सेंटर में तो मरीजो की संख्या कभी कम ही नही होती। सोनोग्राफी उसी दिन तो कभी संभव ही नही है। बाकायदा किसी को दो चार दिन तो किसी को हम्ते दो हफ्ते बाद आने की बात कही जाती है। ऐसी अव्यवस्था का सबसे ज्यादा खामियाजा उन गर्भवती महिलाओं को झेलना पड़ता है जिन्हे उपचार की आवश्यकता तो आज है लेकिन सलाह सोनोग्राफी हफतो बाद हो पाती है। जबकि बाजार में सोनोग्राफी के कम से कम 600 रूपये लिये जा रहे है। डाक्टरो के  अनुसार शिशु के गर्भ में आने व प्रसव के पहले तक करीब 3 से 4 बार महिला की सोनोग्राफी कराई जाती है। कई बार केस क्रिटिकल होने पर सोनोग्राफी की संख्या भी बढ़ती है। मजबूरी का आलम यह है कि जिला चिकित्सालय में सोनोग्राफी के लिये हफ्तो का वक्त लगने से उन्हे निजी अस्पतालो का रूख करना पड़ रहा है। जिला चिकित्सालय में रोजाना सैकड़ो की संख्या में महिलाये इलाज के लिये पहुंचती है। इनमें से दर्जनो की सोनोग्राफी होती है। लेकिन सोनोग्राफी के लिये लंबी वेटिग के चलते महिलाओं को कई कई दिनों तक भटकना पड़ता है। बताई गई तारीख में सोनोग्राफी हो जाये इस बात की भी कोई गांरटी नही। 

लेटलतीफी की ये है वजह
जिला चिकित्सालय में वर्षो से रेडियोलाजिस्ट सहित स्वीकृत स्टाफ की पदस्थापना नही है। पीसीपीएनडीटी एक्ट की पेचीदिगियों के चलते रिकार्ड संधारण और आनलाइन फार्म भरने की प्रक्रिया में देरी। सोनोग्राफी के लिये जिला चिकित्सालय में महज एक मषीन होने व एक डाक्टर के होने की वजह से भी सोनोग्राफी में विलंब होता है। जिसकी सेवाओं में कमी का खामियाजा मरीजो को भुगतना पड़ रहा है।  

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