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मध्यप्रदेश में यहां राम नहीं रावण की होती है पूजा

बैतूल| देश भर में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक का पर्व दशहरा धूम धाम से मनाया जाता है और रावण दहन कर खुशियां मनाई जाती है| लेकिन मध्य प्रदेश में कई जगह ऐसी भी हैं जहाँ रावण का दहन नहीं किया जाता बल्कि पूजा की जाती है| कुछ लोग राम की पूजा करते हैं तो कई रावण की, यह अक्सर विवाद का कारण भी बन जाता है| ऐसा ही एक गांव है बैतूल जिले के सारणी में,  यहां रहने वाले आदिवासी रावण को अपना कुल देवता मानते हैं। रावण दहन की रात को सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग रावण के मंदिर में पहुंचते हैं और रावण दहन का शोक मनाते हैं। अब यह आदिवासी समुदाय रावण दहन न करने की मांग कर रहे हैं| इससे उनकी भावनाएं आहत होती हैं| ये मांग जिले के छतरपुर गांव से उठी है जहां 2000 फ़ीट ऊंची पहाड़ी पर लंकापति रावण का मंदिर है|

लगाए जय लंकेश के नारे

सैलून पुरानी रावण दहन की परंपरा को ख़त्म करने के लिए आदिवासी एकजुट हुए  हैं| शनिवार को सारनी में पारंपरिक वेषभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ आदिवासियों ने रैली निकाली और थाने पहुंचकर विरोध किया। उन्होंने कहा रावण को जलाना और राक्षस कहना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। इतना ही नहीं आदिवासियों ने  अपने कुल देवता जय लंकेश के नारे भी लगाए। देश मे केवल कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहां रावण से जुड़े प्रमाण मिलते हैं जिनमे बैतूल भी एक है|

रावण राक्षस नहीं

पिछले दिनों छतरपुर समेत अन्य गांवों के आदिवासी सारनी में एकजुट हुए थे। रावण दहन स्थल रामरख्यानी स्टेडियम में उन्होंने आदिवासी भाषा में गोष्ठी की। आदिवासी समुदाय ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है जिसमे  बताया रावण कोई राक्षस नहीं है। दशहरे पर सारनी के रामरख्यानी और पाथाखेड़ा के फुटबॉल मैदान में रावण का दहन होता है। खुशी में आतिशबाजी होती है। यही नहीं पूरे देश में रावण दहन धूमधाम से होता है। इससे आदिवासियों की धार्मिक भावना आहत होती है।

रावण, मेघनाद और महिषासुर आदि आदिवासियों के कुल देवता हैं। वे इनकी पूजा करते हैं। दशहरे में इनके स्वरूप पुतले जलाना या इन्हें राक्षस कहना संस्कृति द्रोही है। यह देशद्रोह की श्रेणी में आता है। संविधान की धारा 25 के तहत सभी को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। उन्होंने श्रीराम मंदिर के सामने पारंपरिक वाद्यों के साथ जय लंकेश के नारे लगाए। थाने में एसडीओपी पंकज दीक्षित और टीआई विक्रम रजक को ज्ञापन सौंपा।

यहाँ नहीं होता रावण दहन

जोधपुर शहर में रावण के वंशज रावण दहन पर शोक मनाते हैं। दुर्ग के खम्हरिया में रावण मंदिर है। विदिशा जिले में विजयादशमी पर रावण पूजन होता है|हर अदिवासी गांव में रावण के पुत्र मेघनाद की होली के बाद पूजा होती है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं|

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